Book Title: Mahanishith Sutram
Author(s): Padmasenvijay, Kulchandravijay
Publisher: Jain Sangh Pindwada

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Page 235
________________ २२४ श्री महानिशीथ सूत्रम्-अध्य०७ से भयवं ! जे णं गणी किंचियावस्सगं पमाएजा ? गोयमा ! जे णं गणी अकारणिगे किंचि खणमेगमवि पमाए से णं अवंदे उवइसेज्जा । जे णं तु सुमहाकारणिगेवि संते गणी खणमेगमवी ण किंचि णिययावस्सगं पमाए से णं वंदे पूए दट्टब्वे जाव णं सिद्धे बुद्धे पारगए खीणट्ठकम्ममले नीरए उवइसेज्जा, सेसं तु महया पबंधेणं सत्थाणे चेव भाणिहिइ ।१६। एवं पच्छित्तविहिं सो उणाऽणुटुती अदीणमणो, झुंजइ य जहाथामं जे से आराहगे भणिए ।।२०।। जलजलणदुट्ठसावयचोरनरिंदाऽहिजोगिणीण भए । तह भूयजक्ख- रक्खसखुद्दपिसायाणं मारीणं ।।२१।। कलिकलहविग्घरोहग- कंताराडइसमुद्दमझे वा । दुच्चिंतिय अवसउणे संभरियव्वा इमा विजा ।।२२।। *प्आएह्इं जन्अम्द्अन्उ अम्घअन्इउम्म्एह्इम् तुइव्इक्कअम्ल नआह्इह्इम् अव्व्अन्आभउ ह्इअए अर्ज भउएइम् म्अस्उद्अण्उ म्अत्थ्अइ दएउ अन्अम्त्उ एह्इम् अत्थ्अस्इख्अण्अम् घ्एपइस्अम् तओ एयाए पवरविजाए विहीए अत्ताणगं समहिमंतिऊणं इमेए सत्तक्खरे उत्तमंगोभयखंधकुच्छीचलणतलेसु संणिसेज्जा,२ तंजहा-अउम् उत्तमंगे, उ वामखंधगीवाए, उ वामकुच्छीए, उ वामचलणयले, लए दाहिए चलणयले, स्वआ दाहिए कुच्छीए, हुआ दाहिणखंधगीवाए ।१७। 'दुसुमिणदुन्निमित्ते गहपीडुवसग्गमारिरिट्ठभए । वासासणिविज्जूए, वायारिमहाजणविरोहे ।।२३।। जं चऽस्थि भयं लोगे, तं सव्वं निद्दले इमाए विजाए । 'सत्थपहे मंगलयरे रिद्धियरे पावहरे सयल-वरऽक्खयसोक्खदाई ‘सण्हट्टे' 'सण्हद्धे' च पाठान्तरमिति । " पाएहिं जणंदणु, जंघनिउम्मेहिं तिविक्कमु । नाहिहिं पवनाभु, हियए हरू भुएहिं महुसुदणु ॥ मत्थइ देउ अणंतु एहिं अत्थसिक्खणं घेपिस्सं ॥ २ 'सन्यसेदिति'

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