Book Title: Khartargacchacharya Jinmaniprabhsuriji Ko Pratyuttar
Author(s): Tejas Shah, Harsh Shah, Tap Shah
Publisher: Shwetambar Murtipujak Tapagaccha Yuvak Parishad

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Page 75
________________ __ परिशिष्ट 12 आ. मणिप्रभसूरिजी द्वारा तपागच्छाचार्यों का घोर अपमान आ. मणिप्रभसागरजी द्वारा सामान्य व्यवहार की भी उपेक्षा को क्या कहें ? सामान्य अल्प ज्ञानी शिष्ट पुरूष भी अपने से बडो का आदर करते हैं, अपमान नही करता / पर जब अहंकार का नशा चढा हो तो जीव सुध बुध खो बैठता हैं और विवेक की छलनी छलनी कर देता हैं। आ. हेमचंद्रसागरसूरिजी, जो उनसे भी पर्याय में बड़े हैं उनको पूरे उज्जैन के श्रीसंघ ही नही अपित जैन अजैन के सामने अपमानित किया हैं।अपने से बडे आचार्य को अपने से नीचे बिठाकर श्रावक वर्ग को विनय का उपदेश देना कितना हास्यास्पद हैं। जहाँ श्री दशवैकालिक सूत्र में विनय गुण रक्षा हेतु वडिल साधु के उपकरण, पाट आदि को भी पैर लगने पर उनसे क्षमा माँगने का कहा हैं वहीं अपने से पर्याय वृद्ध को अपने से नीचे बिठाकर आगम का उपदेश देने वाले मणिप्रभसागरजी ने जिनाज्ञा का पालन किया या आगमों की, जिनवचनों की अवहेलना ? ऐसा मान कषाय निंदनीय नही हैं क्या ? DOORAKOOOOOOOL 00000000002O90968 0000000000000000 600000000000000

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