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( १५४ ) लग्नपो लाभपश्चापि लाभे स्यातामुभौ यदि । स्थितौ द्रष्काण एकस्मिन्प्रष्टुर्लाभस्तदा ध्रुवम् ॥१५३॥ लग्नपः पुत्रपश्चापि पुत्रे स्यातामुभौ यदि। स्थितौ द्रष्काण एकस्मिन्पुत्रप्राप्तिस्तदा भवेत् ॥१५४॥ एवं द्वादशभावेषु द्रष्काणैरेव केवलैः।
बुधो विनिश्चितं ब्रूयाद्भावेष्वन्येषु निस्पृहः ॥१५॥ अर्थात् यदि लग्नेश एवं लाभेश दोनों लाभ स्थान में एक ही द्रेष्काण में हों, तो पृच्छक को निश्चित रूप से लाभ होता है यदि लग्नेश और पञ्चमेश दोनों पञ्चम स्थान में एक ही द्रेष्काण में बैठे हों तो पुत्र प्राप्ति होगी। इस प्रकार द्वादशभावों में केवल द्रेष्काणों के द्वारा फल कहना चाहिए तथा अन्य प्रश्नों पर विचार करना चाहिए।
भाष्य : लग्नेश और कार्येश दोनों यदि कार्य भाव में स्थित हों, तो कार्य की सिद्धि होती है। इसी सिद्धांत के आधार पर यदि लग्नेश और लाभेश (कार्येश) ये दोनों यदि लाभ (कार्य) स्थान में स्थित हों तो लाभ का पूर्णयोग बनता है। वस्तुतः लग्नेश लेने वाला और लाभ देने वाला है। अतः इन दोनों का योग निश्चित रूप से लाभप्रद है। यदि ये दोनों ग्रह एक ही द्रेष्काण में स्थित हों तो पूर्णलाभ का योग बनता है। इसी रीति से लग्नेश और पंचमेश का पंचम भाव में एक द्रेष्काण में योग होने से पुत्र प्राप्ति का पूर्ण योग बनता है। ग्रन्थकार का कहना है कि इसी प्रकार लग्नेश और दशमेश के एक स्थान में एक द्रेष्काण में योग होने से राज्यलाभ तथा लग्नेश और धनेश के एक स्थान में एक द्रष्काण में स्थित होने पर धन लाभ होता
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