Book Title: Ahimsa Vani 1952 06 07 Varsh 02 Ank 03 04
Author(s): Kamtaprasad Jain
Publisher: Jain Mission Aliganj

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Page 57
________________ * उत्तर भारत की जैन मूर्ति कला ४५. स्नान । कहीं सुन्दरियों के द्वारा मंजरी, पुष्प या फल दिखाकर शुक्रादि पक्षियों को लुभाने का दृश्य है तो कहीं वनिताओं के केशों में गुंथे हुए मुक्ताजालों अथवा उनकी दन्त पंक्तियों के लोभी हंसों का । इसी प्रकार अशोक चम्पक, बकुल, कदम्ब आदि वृक्षों की डाली थामे सन्नतांगी रमणियों के ललित अंग विन्यासों के भी चित्रण देखने को मिलते हैं । सौंदर्य के निंद्य साधन के रूप में नारी की उपस्थिति प्राचीन जैन कला में विशेष रूप से उल्लेखनीय है । हमारे कलाविदों ने कला के उस रूप की अभिव्यक्ति को आवश्यक माना, जिसके द्वारा न केवल लोकरंजन की सिद्धि हो अपितु समाज और धर्म को निष्क्रिय एवं निर्जीव होने से बचाया जा सके । मूर्ति कला में नारो के श्री रूप की अभिव्यक्ति कर उन्होंने अपने इस स्पृहणीय उद्देश्य को चरितार्थ किया । उन पर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते हैं । कलाकारों ने प्रकृति तथा मानव जीवन इन दोनों से अलंकरण की सामग्री को जिंस खूबी से छांटकर अपनी कृतियों पर उसका उपयोग किया है वह नितांत सराहनीय है । कला के दिव्य आदर्शों के प्रेरित होकर उन्होंने सृष्टि की अपार रूप सामग्री से अपनी रचनाएँ विभूषित कर उन्हें शाश्वत रूप प्रदान किया प्राकृतिक सौंदर्य से सम्पन्न नदी, पर्वत और भरने, कमल, अशोक, नागकेशर, कदम्ब, चम्पक आदि लता वृज्ञ तथा बनों में सानन्द विच रण करने वाले पशु-पक्षी ये सभी कनाकारों द्वारा आवश्यतानुसार ग्रहण किए गए हैं । इन प्राकृतिक उपकरणों के साथ मानवी रूप का सामजस्य भारतीय शिल्पियों और विशेष कर मथुरा के कलाकारों की एक अनोखी देन है । जिस प्रकार भारतीय साहित्य में संसार को पूर्णरूप से समझने तथा जीवन का वास्तविक आनन्द प्राप्त करने के लिए प्रकृति को एक अनि वार्य अंग माना गया है उसी भाँति यहाँ के कलाविदों ने भी अपने क्षेत्र में इस तत्व को अभिव्यक्त किया है । मथुरा की कला में वेदिका स्तंभों आदि पर हमें इसके प्रत्यक्ष उदाहरण मिलते हैं । कहीं वनों में स्त्री-पुरुषों द्वारा पुष्प संचय क्रिया जा रहा है, तो कहीं fri और जलाशयों में 1 यहाँ हम एक बात का उल्लेख और कर देना चाहते हैं । वह है जैन धर्म और कला के उत्थान में महिलाओं का योग । हमारे धर्म की रक्षा एवं उसके प्रसार में समय-समय पर स्त्रियों ने जो क्रियात्मक भाग लिया वह पुरुषों से न्यून नहीं है । बल्कि कुछ बातों में तो स्त्रियों का योग पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक है । मथुरा की जैन कला मै - जो सैकड़ों कलाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं, उनमें अधि

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