Book Title: Adorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Author(s): Hansraj Pt
Publisher: Atmanand Jain Sabha

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Page 243
________________ ( १९८ ) पूज्यपाद परमोपकारी आचार्य भगवान श्रीमद्विजयवल्लभसूरीश्वरजी महाराज लाहौर से अनेक ग्राम और नगरों में उपदेश देते हुए गुजरानवाला पधारे । उपाध्यायजी श्री सोहनविजयजी पांच महीनों से खांसीकी बीमारी से लाचार थे । गुजरानवाला आकर पंजाब महासभा के संगठन को उन्होंने खूब मजबूत किया और गुरुकुल के लिए उन्होंने इतना परिश्रम किया कि उनकी छाती दुःखने लग गई। श्री नवपदजी की आराधना के निमित्त उन्होंने बहुत दिनों तक मौनावलंबी हो कर आयंबिल की तपश्चर्या की । तप और जाप सदा कल्याण के हेतु हैं, मगर उनके आयु की समाप्ति होने आई थी । उसमें शारीरिक परिश्रम आदि निमित्त मिल गए । उपाध्यायजी की व्याधि असाध्य हो गई। अब एक ही बात बाकी थी । मैं यह चाहता था कि इनकी हार्दिक इच्छायें पूर्ण हो जायँ ताकि उनकी आत्मा को पूर्ण शांति मिले। प्रेमोद्यान भाईखलां से चल कर जब हम माहिम पहुंचे, श्रीयुत् मकनजी झूठा बार. एट. लॉ. ने खार में अपने बंगले में पधारने की विनती की। हम वहां पहुंचे । बम्बई के हजारों श्रावक श्राविकायें वहां एकत्रित हुई थीं। पूजा और स्वामीवत्सल का ठाठ हो रहा था, मगर मेरी आत्मा उपाध्यायजी की चिन्ता में लीन थी। ___ उस दिन सेठ विट्ठलदास ठाकुरदास जो मेरे जन्मान्तर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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