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________________ चतुविशति-जिनस्तुतिः __ [ गुजराती समश्लोकी - अनुवाद ( अनुवादक-भानुभाई व्यास 'बादरायण' ) 1. अ- अर्हत् जे सर्वमन्त्रोमां, मन्त्र उत्तम ते नमूं। सुवर्णसम धातुमां, मेरुं शो पर्वतो मांही / / आनन्दे तेज धारामां, सज्जनो नहि दुर्जनो / सूर्योदय थतां राचे, कमलो नहि घूवडो॥ 3. इ. . इंगिते समजे प्राज्ञो भावने न जडे कदि / लगाम हालतां मात्र चाले अश्वो न गर्दभो // आ 4. ई- ईश्वर पूज्ये लाधे नित्य सौंदर्य शाश्वत / चिन्तामणि भजै तेने केम दारिद्रय सांपडे ? // 5. उ- . उद्यमी सर्व कार्याने एकले पण साधतो / हणे अंधकार एकाकी नभ पार जतो रवि / / 6. ऊ- ऊर्ध्व निष्पाप जाताने लघुता जे तजे नहि। - तुंबडं पकडील्यु जे तरे पाणी परे सही // 7. ऋ- ऋजुताने ऋजुता घटे वांको वंकाय सर्वदा / सोटी नेतरनी वांसलांस छे उदाहरण सही // 8. ऋ ऋकार जेम दीर्घत्व, कदिये जे तजे नहि / आदि-स्थान न पामे ते शब्दमां पदमां कदि / 9. लु- लकार मित्रता राखे ऋ साथे लघुता वडे / मैत्री जगज्जनो पामे ऋजुता हृदये धरे // P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036425
Book TitleChar Granth Sangraha - Panch Parmeshthi Gunmala - Chaturvinshati Jinstutaya - Varnakram Sukti Panchashika - Gautam Swami Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaydharmdhurandharsuri
PublisherSyadvadamrut Prakashan Mandir
Publication Year1994
Total Pages145
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size98 MB
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