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________________ परिशिष्ट-2] 145} अन्वयार्थ-आठवाँ अणट्ठादण्ड = बिना प्रयोजन ऐसे काम करना जिसमें जीवों की हिंसा होती है। विरमण व्रत = निवृत्ति रूप व्रत लेता हूँ। चउव्विहे अणट्ठा दंडे पण्णत्ते = वे अनर्थ कार्य चार प्रकार के हैं। तं जहा = जो इस प्रकार हैं-, अवज्झाणायरिये = अपध्यान (आर्तध्यान, रौद्रध्यान) का आचरण करने रूप । पमायायरिये = प्रमाद का आचरण करने रूप। हिंसप्पयाणे = हिंसा का साधन । पावकम्मोवएसे = पापकारी कार्य का उपदेश देने रूप । एवं आठवाँ अणट्ठादण्ड = इस प्रकार के आठवें व्रत में अनर्थ दंड का । सेवन का पच्चक्खाण = सेवन करने का त्याग करता हूँ। (सिवाय आठ आगार रखकर के जैसे) आए वा = आत्मरक्षा के लिए । राए वा = राजा की आज्ञा से । नाए वा = जाति जन के दबाव से । परिवारे वा = परिवार वालों के दबाव से, परिवार वालों के लिए। देवे वा = देव के उपसर्ग से । नागे वा = नाग के उपद्रव से । जक्खे वा = यक्ष के उपद्रव से । भूए वा = भूत के उपद्रव से । एत्तिएहि = इस प्रकार के अनर्थ दण्ड का सेवन करना पड़े तो। आगारेहिं = आगार रखता हूँ। अण्णत्थ = उपरोक्त आगारों के सिवाय । कंदप्पे = कामविकार पैदा करने वाली कथा की हो, कुक्कुइए = भंड-कुचेष्टा की हो, मोहरिए = मुखरी वचन बोला हो यानी वाचालता से असभ्य वचन बोलना । संजुत्ताहिगरणे = अधिकरण जोड़ रखा हो। उवभोगपरिभोगाइरित्ते = उपभोग-परिभोग अधिक बढ़ाया हो।।8।। भावार्थ-बिना प्रयोजन दोषजनक हिंसाकारी कार्य करना अनर्थदंड है। इसके चार भेद हैं-अपध्यान, प्रमादचर्या, हिंसादान और पापोपदेश। इष्ट संयोग व अनिष्ट वियोग की चिंता करना, दूसरों को हानि पहुँचाने का विचार करना अर्थात् मन में किसी भी प्रकार का दुर्ध्यान करना अपध्यान है। असावधानी से काम करना, धार्मिक कार्यों को त्यागकर दूसरे कार्यों में लगे रहना प्रमादचर्या है। दूसरों को हल, ऊखल-मूसल, तलवार-बंदूक आदि बिना प्रयोजन हिंसा के उपकरण देना हिंसादान है। पाप कार्यों का दूसरों को उपदेश देना पापोपदेश है। मैं इन चारों प्रकार के अनर्थदंड का त्याग करता हूँ। (यदि आत्मरक्षा के लिए, राजा की आज्ञा से, जाति के तथा परिवार के, कुटुम्ब के मनुष्यों के लिए, यक्ष, भूत आदि देवों के वशीभूत होकर अनर्थदंड का सेवन करना पड़े तो इनका आगार, अपवाद-छूट, रखता हूँ। इन आगारों के सिवाय) मैं जन्म पर्यंत अनर्थदंड का मन, वचन, काया से स्वयं सेवन नहीं करूँगा और न कराऊँगा। यदि मैंने काम जाग्रत करने वाली कथाएँ की हों, भांडों की तरह दूसरों को हँसाने के लिए हँसी-दिल्लगी की हो या दूसरों की नकल की हो, निरर्थक बकवाद किया हो, तलवार, ऊखल, मूसल आदि हिंसाकारी हथियारों या औजारों का निष्प्रयोजन संग्रह किया हो, मकान बनाने आदि आरंभ-हिंसा का उपदेश दिया हो, अपनी तथा कुटुम्बियों की आवश्यकताओं के सिवाय अन्न, वस्त्र आदि का संग्रह किया हो तो मैं उसकी आलोचना करता हूँ और मैं चाहता हूँ कि मेरे सब पाप निष्फल हों। 9. नवमाँसामायिक व्रत-सावज्जंजोगं पच्चक्खामि, जाव नियमं पज्जु सामि दुविहं तिविहेणं न
SR No.034357
Book TitleAavashyak Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHastimalji Aacharya
PublisherSamyaggyan Pracharak Mandal
Publication Year
Total Pages292
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size2 MB
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