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________________ सायरने कांठे, प्रतिमा घरे विसरी गइ ए ॥ १६ ॥ दातण करवा नीमरे, लीधो पचखाण, जनवचन केम नांगीए ए ॥ गण वेबु करी नेलोरे, बिंब कीधो नवो, पूजा करी पगे लागीए ए ॥ १७ ॥ अनुक्रमे दरशन कीधोरे, प्रतिमा कुपक मांही, मूकीने सहु चालीया ए ॥ घणा काल लगी मांहीरे, अधिष्टाता तिहां, धरणे तिहां जालीया ए ॥ १७॥ श्रावी काढ्यो बिंबरे, अंबर अधर राखी, अंतरिक नाम थापीयो ए ॥थागे एहनो विस्ताररे, बहुश्रुत ते जाणे, माहरी मत सारु व्यापीयो ए॥१५॥ पांचमा खंड तणीरे, ढाल बही ए कही, श्रोता सुगुण जणी गमी ए॥ रंगविज-|| यनो शिष्यरे, नेमविजय कहे, माहरा दिलमां ए रमी ए ॥२०॥ उदा. लश्कर सह नेलो मली, श्राव्या वन वंशजाल ॥ रामचंड लक्ष्मण बेने, खबर थइ ततकाल ॥ १॥ लक्ष्मण कहे रामचंउने, तुमे सीताने पास ॥ रहेजो सावधान थका, हुँ जाउं लडवा तास ॥२॥ जो हुं नाद करूं सिंहनो, तो मुज करजो वार मेलशो मां सीता रली, कहुं बुं वारंवार ॥३॥ लक्ष्मण चाट्या फुजवा, लश्कर सन |
SR No.034172
Book TitleDharmpariksha Ras
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages336
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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