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________________ वापसी का प्रश्न नेल्लियाप्पियर मानमदुरा में दूसरे दरजे के वकील थे। इसलिए जहाँ तक जरूरत पड़ने पर छुट्टी लेने का सवाल था, वह अपने मालिक स्वय थे। यह समाचार सुनते ही वह एकदम एक मित्र के साथ इस समाचार की सत्यता जानने के लिए तिरुवन्नामलाई के लिए रवाना हो गये । वह स्वामी के पास गये । स्वामी आमो के बगीचे में ठहरे हुए थे और इस बगीचे के मालिक वेंकटराम नायकर ने उन्हे अन्दर जाने से रोक दिया, "वह मौनी है। आप अन्दर जाकर उसकी तपस्या मे विघ्न क्यो डालते हो?" जब उन्होंने यह कहा कि वह स्वामी के सम्बन्धी हैं, तो उसने उनसे कहा कि वह अधिक से अधिक यह कर सकता है कि वह स्वामी को एक पत्र लिखकर भेज दें। नेल्लियाप्पियर ने कागज के एक टुकडे पर लिखा, "मानमदुरा का वकील नेल्लियाप्पियर आपसे मिलना चाहता है।" लोकिक व्यवहारो के प्रति तीक्ष्ण दृष्टि के साथ-साथ स्वामी उनके प्रति पूणत आसक्त थे और इसी कारण उनके अनेक भक्तजन विस्मय मे पड जाते थे। उन्होने देखा कि जिस कागज पर उनके चाचा ने सदेश लिखकर भेजा था, वह पजीयन विभाग से आया था और इसकी दूसरी तरफ उनके बडे भाई नागास्वामी के हाथ का लिखा हुमा कुछ कार्यालय सम्बन्धी विषय था। इससे उन्होंने यह परिणाम निकाला कि नागास्वामी ने पजीयन विभाग में क्लक की नौकरी कर ली है। इसी तरह बाद के वर्षों में वह पत्र को उल्टा करके देखा करते और इसे खोलने से पहले इस पर लिखे पते और डाक-मुहर को ध्यान से देखा करते। __उन्होने दशको को अन्दर आने की आज्ञा दे दी, परन्तु जब वह अन्दर आ गये, स्वामी मौन होकर बैठे रहे और उन्होने अभी-अभी उनके पत्र की परीक्षा करने मे जो दिलचस्पी दिखायी थी, उसका चिह्नमात्र भी अब दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था । जरा मी दिलचस्पी प्रशित करने से वह यह समझते कि स्वामी के घर लौटने की माशा है, जो कि सवथा निष्फल थी। स्वामी अस्त-व्यस्त दशा में विना स्नान किये बैठे थे, उनके नाखून बढ़े हुए थे और वालो ने जटाओं का रूप धारण कर लिया था । नेल्लियाप्पियर उन्हे इस अवस्था में देखकर अत्यन्त भावविभोर हो उठे । स्वामी के मौनव्रत का ध्यान रखते हुए उन्होंने पलानीस्वामी और नायकर को वजाय स्वय स्वामी को सम्बोधित करते हुए कहा, "मुझे यह देखकर अत्यन्त प्रसन्नता होती है कि मेरे परिवार के एक सदस्य ने इतनी उच्च स्थिति प्राप्त कर ली है, परन्तु आपको भौतिक सुविधाओ की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।" स्वामी के सम्वन्धी चाहते थे कि वे उनके निकट रहें । वे स्वामी पर अपनी प्रतिज्ञाएँ तोरने या जीवन-पद्धति वदलने के लिए कोई दवाब नही
SR No.034101
Book TitleRaman Maharshi Evam Aatm Gyan Ka Marg
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAathar Aasyon
PublisherShivlal Agarwal and Company
Publication Year1967
Total Pages230
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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