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________________ 15 नैषधमहाकाव्यम् / श्रितेति / श्रिताः सेविताः पुण्याः सर सरितः मानसादीनि सरांसि गङ्गाद्याः सरितश्च येन तत्समाधिना ध्यानेन निमीलनेन क्षपिताखिलक्षपं यापितसर्वरात्रं जलजं दमयन्तीपदमिति नाम यस्मिन् जन्मनि मञ्जुलाङ्गतिं रम्यगतिमुत्तमदशाञ्च, 'गतिर्मार्गे दशायां चेति विश्वः / कथं नैतु एत्ववेत्यर्थः / पदस्य गतिसाधनत्वात्तत्रापि दमयन्तीसम्बन्धाच्चोभयगतिलाभः / तथापि जन्मान्तरेऽपि सर्वथा तपः फलितमिति भावः / सम्भावनायां लोट् // 39 // पवित्र ( मानसरोवरादि ) तडाग तथा ( गङ्गा आदि ) नदियोंका आश्रय करनेवाला (सर्वदा उनमें रहनेवाला) तथा सम्यक प्रकारके कष्ट [ पक्षा०-मुकुलित रहकर नेत्र बन्द करनेरूप समाधि ( योगाङ्गविशेष ) ] से सम्पूर्ण रात्रिको बिताने वाला कमल दमयन्तीके चरणके नामवाले जन्मान्तरमें उत्तम गतिको क्यों नहीं प्राप्त करे ? अर्थात् उसे उत्तम गति को प्राप्त करना उचित ही है / [लोकमें भी कोई व्यक्ति तडाग या नदी आदि पुण्य तीर्थमें रहकर नेत्रोंको बन्दकर समाधि लगाये रातको बितानेसे जन्मान्तरमें उस तपोजन्य फलस्वरूप जिस प्रकार उत्तम गतिको पाता है, उसी प्रकार कमल भी पुण्यतीर्थ मानसादि तडाग एवं गङ्गादि नदियोंमें रहकर रात्रिमें मुकुलित रहनेसे समाधिको धारणकर जो तप किया, उसके फलस्वरूप दमयन्तीके चरणके नाम प्राप्तिरूप उत्तम गतिको पाया ] // 39 // सरसीः परिशीलितुं मया गमिकर्मीकृतनैकनीवृता / / अतिथित्वमनायि सा दृशोः सदसत्संशयगोचरोदरी / / 40 / / अथ कथं त्वमेनां वेत्सीत्यत आह-सरसीरिति / सरसीः सरांसि परिशीलितुं परिचेतुं तत्रविहमित्यर्थः। चुरादिणेरनित्यत्वादण्यन्तप्रयोगः। गमिर्गमनं शब्दपरशब्देनार्थो गम्यते तस्य कर्मीकृताः कर्मकारकीकृताः नेके अनेके नजर्थस्य नशब्दस्य सुप्सुपेति समासः / नितरां वर्तन्ते जना येष्विति नीवृतः जनपदाः येन तेन क्रान्तानेकदेशेनेत्यर्थः / 'नहिवृती'त्यादिना दीर्घः। मया सदसद्वेति संशयगोचरः सन्देहास्पदमुदरं यस्याः सा कृशोदरीत्यर्थः / 'नासिकोदरे'त्यादिना ङी। सा दमयन्ती दृशोरतिथित्वमनायि स्वविषयतां नीता दृष्टेत्यर्थः / नयतेः कर्मणि लुङ // 40 // (आगे नलसे हंस कहता है कि-) तगाडोंका आश्रय करनेके लिए अनेक देशोंको जानेवाले मैंने अतिशय कृश होनेसे 'हैं या नहीं' ऐसे सन्देहके विषयीभूत उदरवाली उस ( दमयन्ती ) को देखा है / [ दमयन्तीका उदर कृश है कि उसे देखकर मुझे सन्देह हो जाता था कि इसका उदर है या नहीं है ? / इस प्रकार उन्तरूपा उस दमयन्तीको अनेक तडागोंमें रहनेके लिए देश-देशान्तरमें भ्रमण करनेवाले मैने देखा है, अतः वैसी परम सुन्दरी रमणी कहीं भी नहीं है, ऐसा आपको विश्वास करना चाहिये ] // 40 / / अवधृत्य दिवोऽपि यौवन सहाधीतवतीमिमामहम् / कतमस्तु विधातुराशये पतिरस्या वसतीत्यचिन्तयम् / / 41 //
SR No.032781
Book TitleNaishadh Mahakavyam Purvarddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1976
Total Pages770
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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