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________________ जयपुर प्रवेश, वि.सं. २०४२ memoeopan २३-८-२०००, बुधवार भाद्र. कृष्णा-८ तीर्थ करते है वह तीर्थंकर है । इस तीर्थ की शक्ति को हृदय में स्थापित करता है वह चतुर्विध संघ है। _ 'सव्वलोअभाविअप्पभाव' 'अजित शान्ति' में प्रयुक्त भगवान का यह विशेषण अत्यन्त ही अद्भुत है । इस पद के दो अर्थ हो सकते हैं - (१) सर्वलोकभावितप्रभाव - समस्त लोक में जिनका प्रभाव ___भावित हो चुका है ऐसे भगवान ।। (२) 'सर्वलोकभावितात्मभावः' जिन्हों ने समस्त लोक के साथ आत्मभाव भावित किया है । यह दूसरा अर्थ अद्भुत है । साधु भी जब तक समस्त जीवों को आत्मभूत नहीं देखते, तब तक साधुत्व में प्राण नहीं आते । आत्म-तुल्य नहीं, परन्तु समस्त जीवों को आत्मभूत मानना । यह साधना की पराकाष्ठा है। ऐसा हो तो ही समस्त आत्माओं में परमात्मा दिखाई देंगे, जीव में शिव दिखाई देंगे । ऐसा दिखाई दे तो क्या किसी भी जीव की आशातना होगी ? आशातना मात्र भगवान की नहीं होती, जीवों की भी होती है । (२८२ 65000 550066 कहे कलापूर्णसूरि - ३)
SR No.032619
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 03 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages412
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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