SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 177
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अपनी आत्मा को जैन प्रवचनों से भावित बनाया है । साधु ही इस विषय - कषायमय दावानल का शमन कर सकता है । - विषय, कषाय दोनों में से विषय अधिक भयंकर है । प्रश्न उत्तर की पूर्ति नही होने से ही जीव कषाय में " जे गुणे से मूल - ठाणे, जे मूल ठाणे से गुणे " भयंकर कौन है ? विषय की 1 कामना सरक जाता है । - आचारांग सूत्र हम यह सब सुनते हैं सही, परन्तु साधना को आगे के लिए स्थगित कर देते हैं । भूख-प्यास शान्त करने के लिए आहार- पानी के लिए हम कितनी शीघ्रता करते हैं ? वैसी खोज कदापि साधना के लिए की ? * चैत्र की ओली यहां पूर्ण हो गई । यहीं रहना है, अतः यहां से ही गोचरी - पानी लेना है, ऐसा न करें । बीस वर्ष पूर्व तो हम सुदूर गांव में से गोचरी लाते थे । * मुनि अर्थात् करुणा - सिन्धु ! दीक्षा अंगीकार की तब से परिवार भले ही छोड़ा, परन्तु अखिल विश्व को परिवार बनाया । किसी के साथ कुछ लेना-देना नहीं; 'मैं अपना करूं' ऐसी वृत्ति नहीं चलती । सभी जीवों के साथ करुणापूर्ण जीवन जीना है । समस्त जीवों के साथ करुणामय जीवन ! जो निरन्तर आत्मा में रमण करे, उसका नाम श्रमण ! * कोई शक्ति या लब्धि प्रकट हो चुकी हो, लोग बिरुदावली गाते हों, परन्तु मुनि उससे फूलते नहीं है; वे अन्तर से निर्लिप्त रहते हैं । इन समस्त ढालों को यदि कण्ठस्थ कर लोगे तो कम से कम इतना ख्याल आयेगा कि मुझे कैसा बनना है ? इन ढालों में हमारे शुद्ध साधु-जीवन का नकशा है । यहां जैसी करनी होगी, वैसी गति परलोक में मिलेगी । दोनों मुनि एक समान देवलोक में गये, परन्तु एक इन्द्र तुल्य कहे कलापूर्णसूरि २ www WWW १५७
SR No.032618
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 02 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages572
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy