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________________ प्रथम अध्याय अनुषाद। इन लोगोंके आततायी ( शत्रु ) होनेसे भी इन लोगोंका प्राण लेनेसे हम लोग पाप भागी होवेंगे, कारण सबान्धव दुर्योधनादिको विनाश करना अस्मदादि को उचित नहीं। हे माधव ! स्वजन वध करके अस्मदादि को क्या सुख. मिलेगा ? || ३६ ॥ व्याख्या। "माधव" मा लक्ष्मी, धव=स्वामी । साधकके मनमें उठता है कि, जो त्रिलोकके नियन्ता हैं, वही माधव-लक्ष्मीपति हैं; फिर वही महापुरुप योगाचार्य भी हैं, उनमें तो भोग, योग, दोनों ही वर्तमान हैं; तब उन्हींका अनुकरण करना अच्छा है। यह सब सोचते हैं कि, ये सब वृत्ति मेरे अन्तःकरणमें हैं इस करके मैं साधनाके रास्तामें बाधा पाता हूँ सही, किन्तु इन सबके नष्ट करनेसे ही हममें धर्म कहां रहता है ? हमारा शरीर रूप संसार इन्द्रियोंके सहारा बिना क्षणमात्र भी चल नहीं सकता। इन्द्रियोंका काम काज बन्द करना ही यदि योग हो, तब पाप और किसको कहूँगा ? इन्द्रियोंके काम काज बन्द होनेसे शरीरमें व्याधि (आत्मपीड़न), उपस्थित जरूर होवेगी; सो कदापि धर्म हो नहीं सकता; स्वजन बध करनेका पाप होगा ही, सुख क्या मिलेगा ? अतएव हे गुरो! इन सबकी रक्षा करके अगर योगका उपाय हो तो मुझसे कहिये, नहीं तो इन सब पाप कर्ममें हमारी प्रवृत्ति नहीं होती ॥ ३६ ॥ यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोष मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३७॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनाईन ॥३८॥ अन्वयः। हे जनाईन! यद्यपि एते (धात राष्ट्राः ) लोभोपहतचेतः ( राज्यलोभेन भ्रष्टविवेकाः सन्तः ) कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकं न पश्यन्ति, कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिः अस्माभिः अस्मात् पापात् निवतितु कथं न ज्ञेयं । (निवृत्तावेव बुद्धिः कर्तव्या इत्यर्थः ) ३७ ॥ ३८ ॥
SR No.032600
Book TitlePranav Gita Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanendranath Mukhopadhyaya
PublisherRamendranath Mukhopadhyaya
Publication Year1997
Total Pages452
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationInterfaith
File Size29 MB
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