SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 628
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५६२ नमो पुरिसवरगंधहत्थीणं गुरु महाराज नित्यकर्म के लिए बाहर पधारते थे तो पीछे मैं अपने आपको उनकी नित्यलिखित डायरी पढ़ने से रोक नहीं पाता था। एक दिन अचानक ही गुरु महाराज तुरन्त पधार गये, मेरे हाथ में डायरी थी और मैं पढ़ रहा था सो उन्होंने देख लिया। फरमाया - चोरी करनी कब से सीख ली ? मैंने कहा - मैं तो खाली डायरी पढ़ रहा था, उसमें से कुछ पन्ने वगैरह तो नहीं निकाले फिर चोरी कैसे हुई ? फरमाया - बिना इजाजत के किसी की डायरी, लिफाफा, पत्र, कार्ड पढ़ना चोरी है। इसमें तीसरे व्रत का दोष लगता है, यह हमेशा ध्यान में रखना। मैं तो डर रहा था कि आज गुरु महाराज कितने नाराज होंगे, एक तरह से कांप ही रहा था। चोरी करने वाले के पांव कच्चे। पर उन्होंने इतने धीरज से समझाया कि आज मैं कभी ऐसी चेष्टा भी नहीं करता। यहाँ तक कि किसी की किताब पड़ी हो तो उसे पूछकर लेता हूँ। -जे.जे. एग्रो इण्डस्ट्रीज, एम.आई.डी.सी. जलगांव (महा.)
SR No.032385
Book TitleNamo Purisavaragandh Hatthinam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDharmchand Jain and Others
PublisherAkhil Bharatiya Jain Ratna Hiteshi Shravak Sangh
Publication Year2003
Total Pages960
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size34 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy