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________________ पंचमपरिच्छेद ४५१ ॥ अथ उपदेशी प्रजाती पद ॥ जाग जाग रयण गश्नोर नयो प्यारे ॥ पंचकुं प्रपंच कर, वश यारे ॥ जाग जाग रयण गइ जोर जयो प्यारे ॥१॥ ए आंकणी ॥ तृषनामे मीन मरे, नोगमें मतंगा ॥ श्रवणमें कुरंग मरे, नयनमें पतंगा ॥ जाण ॥२॥ वासनामें चमर मरे नासा रस लेतां ॥ एक एक इंजीसंग, मरे जीव केता ॥जा॥३॥ पंचके पड्यो तुं फंद, कयुं कर वश आवे ॥ मार तुं मन इछा नूत, ज्युं निरंजन पावे ॥ जाग० ॥४॥ ॥अथ प्रनाती रागमां पद ॥ में परदेशी दूरका, प्रजु दरसनकुं आया ॥ला ख चोराशी देश फिरया, तेरा दरिसन पाया ।मे॥ ॥ १ ॥ सूदम बादर निगोदमें, वनस्पति बसाया ॥ अप तेज वायुकायमें काल अनंत गमाया ॥ में ॥ ॥२॥ स्वर्ग नर्क तिर्यंचमें, केता जन्म गमाया ॥ मनुष्य अनारजमें नम्या, तिहां नही दरिसन पा या ॥ में० ॥३॥ तेरो मेरो दरिसन अब नयो, पुर न पुन्य पसाया ॥ रुपचंद कहे नाग्य खुले, निरंज न गुण गाया ॥ मे ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥अथ मनहित शिक्षानुं पद ॥ ॥राग कल्याण ॥रे मन लोनी तेरो कोण पति यारो ॥रे मन ॥ आठ गांउको सांगे मीगे, गांठ गांठ रस न्यारो ॥रे मन० ॥१॥ डिनमें उरे पल
SR No.023329
Book TitleJain Dharm Sindhu
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMansukhlal Nemichandraji Yati
PublisherMansukhlal Nemichandraji Yati
Publication Year1908
Total Pages858
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size17 MB
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