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________________ पाठ - 20 प्राकृत वाक्यों का संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद 1. प्रा. पाणाणमच्चए वि जीवेहिं अकरणिज्जं न कायव्वं, करणीयं च कज्जं न मोत्तव्वं । सं. प्राणानामत्ययेऽपि जीवैरकरणीयं न कर्तव्यं, करणीयं च कार्यं न मोक्तव्यम् । हि. प्राणान्ते (प्राणों के विनाश में) भी जीवों को अकार्य नहीं करना चाहिए और करने योग्य कार्य को छोड़ना नहीं चाहिए । 2. प्रा. धम्मं कुणमाणस्स सहला जंति राईओ । सं. धर्मं कुर्वतः सफला यान्ति रात्र्यः । हि. धर्म करनेवाले की रात्रियाँ सफल होती हैं । 3. प्रा. जेण इमा पुहवी हिंडिऊण दिट्ठा सो नरो नूणं वत्थूणं परिक्खणे विक्खणो हो । सं. येनेमा पृथ्वी हिण्डित्वा दृष्टा, स नरो नूनं वस्तूनां परीक्षणे विचक्षणो भवति । हि. जिसके द्वारा यह पृथ्वी भ्रमण करके देखी गई, वह मनुष्य सचमुच वस्तुओं की परीक्षा में चतुर = कुशल होता है । 4. प्रा. एगो जायइ जीवो, एगो मरिऊण तह उवज्जेइ | एगो भइ संसारे, एगो च्चिय पावई सिद्धिं ||30|| सं. जीवः एको जायते, तथैको मृत्वोत्पद्यते । एकः संसारे भ्राम्यति, एक एव सिद्धिं प्राप्नोति ||30|| हि. जीव अकेला उत्पन्न होता है तथा अकेला मरकर जन्म लेता है, अकेला संसार में भ्रमण करता है, अकेला ही मोक्ष को प्राप्त करता है । 5. प्रा. कालसप्पेण खाइज्जन्ती काया केण धरिज्जइ ?, नत्थि तत्थ कवि उवाओ । सं. कालसर्पेण खाद्यमाना काया केन ध्रियेत ? नास्ति तत्र कोऽप्युपायः । हि. कालरूपी सर्प से भक्षण की जानेवाली काया किसके द्वारा धारण की जाय ?, वहाँ कोई भी उपाय नहीं है ।
SR No.023126
Book TitleAao Prakrit Sikhe Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaysomchandrasuri, Vijayratnasensuri
PublisherDivya Sandesh Prakashan
Publication Year2013
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size36 MB
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