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________________ निर्वचनका अर्थात्मक महत्त्व है। व्याकरणके अनुसार पा पालने या रक्षणे धातुसे असुन् प्रत्यय +जुट कर -पाजः शब्द बनाया जा सकता है। (७८) प्रसिति :- इसका अर्थ होता है जाल, पाश। निरुक्तके अनुसार . प्रसितिः प्रसयनात तन्तुर्वा जालं वा५२ अर्थात प्रसिति शब्द प्र + सि बन्धने धातुके योगसे निष्पन्न होता है क्योंकि इसे बांधकर बनाया जाता है या इससे बांधा जाता है। इस निर्वचनका ध्वन्यात्मक एवं अर्थात्मक आधार उपयुक्त है। भाषा विज्ञानके अनुसार इसे उपयुक्त माना जायगा। व्याकरणके अनुसार प्र+ षिञ् वन्धने धातुसे क्तिन् प्रत्यय कर प्रसिति: शब्द बनाया जा सकता है।६७ (७९) तृष्वी :- यह शब्द शीघ्र या क्षिप्रका पर्याय है। निरुक्तके अनुसार १तृष्वीति क्षिप्रनाम तरतेर्वा५२ अर्थात् तृष्वी शब्द त प्लवन संतरणयो: धातुके योगसे निष्पन्न होता है। इसके अनुसार इसका अर्थ होगा सन्तरित होने वाला। २- त्वरतेर्वा५२ अर्थात् इस शब्दमें त्वर् संभ्रमे धातुका योग है क्योंकि यह शीघ्रता के गुणसे युक्त है। प्रथम निर्वचनका ध्वन्यात्मक एवं अर्थात्मक आधार उपयुक्त है। भाषा विज्ञानके अनुसार इसे उपयुक्त माना जायगा। द्वितीय निर्वचन अर्थात्मक महत्त्व रखता है। लौकिक संस्कृतमें इसका प्रयोग प्रायः नहीं देखा जाता। (८०) तपिष्ठैः :- यह तृतीयान्त बहुबचनका रूप है। यह अनेकार्थक है। निरुक्तके अनुसार १- तपिष्टैस्तप्ततमैः५२ अर्थात् अत्यन्त सन्ताप देने वाले। इसके अनुसार यह शब्द तप् सन्तापे धातुके योगसे निष्पन्न होता है क्योंकि यह तप्ततम होता है। तृप्ततमैः५२ अर्थात् अत्यन्त तृप्त तम। इसके अनुसार इस शब्दमें तृप् तृप्तौ धातुका योग है। तृप्ट (तमप) इष्ठन्- तपिष्ठः। ३. प्रपिष्ठतमैर्वा५२ अर्थात् अत्यन्त पीसने वाले। इसके अनुसार इस शब्दमें पिष् संचूर्णने धातुका योग है क्योंकि यह प्रपिष्ठतम होता है- पिष्ठतम- तपिष्ठः। प्रथम निर्वचनका ध्वन्यात्मक एवं अर्थात्मक आधार उपयुक्त है। भाषा विज्ञानके अनुसार इसे संगतमाना जायगा। शेष निर्वचनोंका अर्थात्मक महत्त्व है। व्याकरणके अनुसार तप+ तृच् इष्ठन् प्रत्यय कर तपिष्ट:- तपिष्टैः शब्द बनाया जा सकता है।६८ (८१) अमीवा :- इसका अर्थ होता है- रोगोत्पादक क्रिमी। निरुक्तके अनुसार अमीवा अभ्यमनेन व्याख्यातः५२ अर्थात् अमीवा शब्द अभ्यमन से ही व्याख्यात है। अमवान् शब्दके निर्वचनमें यास्कने अभ्यमनवान शब्द दिया है। अमीवाका निर्वचन भी इसीसे हो जायगा।इसके अनुसार अम्+वन् प्रत्यय कर अमीवा शब्द बनाया जा सकता ३५७:व्युत्पत्ति विज्ञान और आचार्य यास्क
SR No.023115
Book TitleVyutpatti Vigyan Aur Aacharya Yask
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamashish Pandey
PublisherPrabodh Sanskrit Prakashan
Publication Year1999
Total Pages538
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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