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________________ कातन्त्रव्याकरणम् ने वुगागम से की है। पाणिनि का सूत्र है - " भुवो वुग् लुलिटो:' (अ० ६।४।८८) । “नोर्वकारो विकरणस्य” (३।३।५९) सूत्रपठित 'वकार:' पद की अनुवृत्ति से ही कार्यसिद्धि होने पर प्रकृत सूत्र में जो पुनः 'व' का ग्रहण किया गया है, वह गुणवृद्धि के बाधनार्थ है । वृत्तिकार दुर्गसिंह ने कहा है- 'पुनर्वकारो गुणवृद्धिबाधनार्थः' । कातन्त्रकार ने प्रकृत सूत्र में ही वकारागम को 'भू' के अन्त में निर्दिष्ट किया है, जब कि कातन्त्रकार ने कित् आगमों के अन्त में विधानार्थ एक स्वतन्त्र परिभाषासूत्र की रचना की है "आद्यन्तौ टकितौ” (अ० १ । १ । ४६) । १०२ [विशेष वचन ] १. तेन वकारो वकार इति वकार एव भवतीत्यर्थ: (दु० टी०) । २. व्यक्तिपक्षे हि शब्दान्तरस्य विधिः प्राप्नुवन्नित्यो भवितुमर्हति (दु० टी० ) । ३. विधानबलाद् वकारस्य स्थितिरेव मन्यते (दु० टी०) । उवादेशे ४. वकारागमे, प्रकृत्याश्रितत्वादन्तरङ्गे कर्तव्ये बहिरङ्गमुत्वमसिद्धं भवतीत्यर्थः। तु कर्तव्ये सिद्धम् अनित्यत्वादस्याश्च परिभाषाया इति (वि० प० ) । [रूपसिद्धि] १. बभूव । भू + परोक्षा – अट् । 'भू सत्तायाम् ' (१ । १) धातु से परोक्षाविभक्तिसंज्ञक परस्मैपद-प्रथमपुरुष एकवचन 'अट्' प्रत्यय, प्रकृत सूत्र द्वारा 'भू' धातु के अन्त में (अन्त्यावयव) वकारागम, "चण्परोक्षाचेक्रीयितसनन्तेषु" (३ । ३ । ७) से 'भूव्' को द्विर्वचन, पूर्ववर्ती 'भूव्' की 'पूर्वोऽभ्यासः' (३ । ३ । ४) से अभ्याससंज्ञा, "अभ्यासस्यादिर्व्यञ्जनमवशेष्यम्' (३ । ३। ९) से व् का लोप, "ह्रस्व:" (३ । ३ । १५) से अभ्यासवर्ती दीर्घ ऊकार को हस्व उकार, "भवतेर : " (३।३।२२) से भू - घटित उकार को अकार तथा "द्वितीयचतुर्थयोः प्रथमतृतीयौ” (३ । ३ । ११) से भ् को ब् आदेश। २. बभूवतुः। भू + परीक्षा- अतुस् । 'भू सत्तायाम्' (१ । १) धातु से परोक्षासंज्ञक अतुस् प्रत्यय तथा अन्य प्रक्रिया पूर्ववत् । ३. बभूवुः । भू + परोक्षा-उस् । 'भू सत्तायाम् ' (१ । १) धातु से परोक्षासंज्ञक उस् प्रत्यय तथा अन्य प्रक्रिया पूर्ववत् । ४. बभूविथ । भू + परोक्षा - थल् । 'भू सत्तायाम् ' (१ । १) धातु से विभक्तिसंज्ञक परस्मैपद-म - मध्यमपुरुष - एकवचन 'थल्' प्रत्यय, ‘इडागमोऽसार्वधातुकस्यादिर्व्यञ्जनादेरयकारादेः” (३ । ७। १ ) से इडागम तथा अन्य प्रक्रिया पूर्ववत् । . ५. अभूवन् । अट् + भू + वकारागम + अन्। 'भू सत्तायाम् ' (११) धातु से अद्यतनीविभक्तिसंज्ञक परस्मैपद - प्रथमपुरुष - बहुवचन 'अन् प्रत्यय, प्रकृत सूत्र से वकारागम, “अड् धात्वादिर्ह्यस्तन्यद्यतनीक्रियातिपत्तिषु" (३ । ८ । १६ ) से अडागम, सिच् प्रत्यय तथा उसका लुक्, “भुवः सिज्लुकि ” (३ । ७ । ३४) से अगुण तथा इडागम का निषेध । ६. अभूवम्। अट् + भू + वकारागम + अम्। 'भू सत्तायाम् ' (१ । १) धातु से अद्यतनीसंज्ञक परस्मैपद-उत्तमपुरुष एकवचन 'अम्' प्रत्यय तथा अन्य प्रक्रिया पूर्ववत् ।। ६०१ । "
SR No.023090
Book TitleKatantra Vyakaranam Part 03 Khand 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJankiprasad Dwivedi
PublisherSampurnanand Sanskrit Vishva Vidyalay
Publication Year2003
Total Pages662
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size32 MB
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