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________________ રરૂપે उपा. या विजयरचिते निक्षेपमिच्छन्तीति गाथार्थः ॥ [ श्रीहारिभद्रीया वृत्तिः] ॥ त्ति ॥ चरणगुणस्थितिश्च परममाध्यस्थ्यरूया, न रागद्वेषविलयमन्तरेणेति तदर्थना तदर्थमवश्यं प्रयाततव्यमित्युपदेशसर्वस्वम् ॥ ॥ इति नयरहस्यप्रकरणम् ॥ अज्ञान से मुक्ति के लिए प्रवृत्ति करनेवाले को मुक्ति नहीं मिलती है, इसलिए "ज्ञान सम्पादन ही मुक्ति का अंग है" । अतएव “प्रथम ज्ञानं ततो दया” इत्यादि आचार्य का वचन संगत होता है । यह मान्यता "ज्ञाननय” की है । तथा उपादेय और हेय वस्तु का ज्ञान होने पर मुक्ति के लिए क्रिया में ही प्रयत्नशील होना चाहिए, क्रियारहित व्यक्ति को मक्ति नहीं मिलती है, इसलिए "क्रिया ही मुक्ति का अंग है।" यह क्रियानय की मान्यता है । क्रियानयवादी अपने मत के समर्थन में-"क्रियैव फलदा पुंसां न ज्ञान फलदं मतम् । नहि स्त्रीभक्ष्यभोगज्ञो ज्ञानादेव सुखीभवेत् ॥” इस वचन को उपस्थित करते हैं । क्रिया ही फल को देती है, ज्ञानमात्र से फल नहीं होता है। स्त्री भक्ष्य और भोग इनके ज्ञान मात्र से किसी को सुख नहीं मिलता है, किन्तु ज्ञान होने के बाद सुख के लिए किया की आवश्यकता पड़ती है। अतः मुक्ति चाहनेवाले को भी किया का आश्रय लेना आवश्यक है, इसलिए क्रियानयवादी को ज्ञान की अपेक्षा से क्रिया में प्रधानता अभीष्ट है । भिन्न-भिन्न मान्यता होने के कारण इन दोनों में विवाद उपस्थित होता है । एवं "नगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवम्भूत" इन सभी प्रभेदभूत नयों के वक्तव्य भी भिन्न-भिन्न हैं। जैसे"संग्रहनय” सामान्यमात्र को मानता है, “व्यवहारनय" विशेषमात्र को मानता है, “नैगमनय” सामान्य और विशेष इन दोनों को मानता है, "ऋजुसूत्रनय' अतीत अनागत को न मानकर वर्तमानमात्र को मानता है, “शब्दनय" विशेषितर प्रत्युत्पन्न (वर्तमान) मात्र का बोध कराता हैं, “समभिरूहनय” उस से विशेषिततर अर्थ का ग्राहक माना गया है, इसलिए वह संज्ञाभेद से भी अर्थ का भेद मानता है, “एवम्भूतनय” तो अत्यंत सूक्ष्म अर्थ को मानता है क्योंकि वह जलाहरणादि क्रियाकाल में ही घट को घट मानता है। अतः मन्तव्य के भेद से इन सभी मूलनयों में विवाद उपस्थित होता है कि किस की मान्यता सत्य है? अथवा नैगमादिनयों में से कौन सा नय नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव हुन चार निक्षेपों में से किस निक्षेप को मानता है. इस में भी विवाद है। इन विवादों को सुनकर आचार्य वस्तुस्थिति को समझाने के लिए कहते हैं कि सर्वनयों का सम्मत वचन यही है कि 'जो चरणगुणस्थित है वही साधु है' । यह वचन सर्वनय सम्मत इसलिए माना गया है कि भावनिक्षेप को सभी नय मानते हैं । निक्षेपचतुष्टय को माननेवाले "नेगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुत्र" इन चारों नयों को भी भावनिक्षेप मानने में कोई विमति नहीं है, शब्द समभिरूढ, एवम्भूत ये तीनों नय तो भावनिक्षेप को ही मानते हैं। "चरणगुणस्थितः" इस पद में "चरण" पद से आचरण विवक्षित है, आचरण क्रियारूप होता है, इसलिए क्रियानय की सूचना "चरण" शब्द से मिलती है । "गुण" पद
SR No.022472
Book TitleNay Rahasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay Gani
PublisherAndheri Gujarati Jain Sangh
Publication Year1984
Total Pages254
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size27 MB
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