SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 314
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ -५३ मायावादविचारः १८१ नित्यत्वे सति द्रव्यारम्भकद्रव्यत्वात् अनणुत्वे सति निरवयवद्रव्यत्वात् आकाशवदित्यादिकं निरस्तम्। दृष्टान्तस्य साधनविकलत्वात्। तस्मात् प्रतिपक्षसाधकानुमानानामभावान विरुद्धाव्यभिचारित्वमस्माभिरुक्तहेतूनां संपनीपद्यते । अपि तु प्रत्यनुमानेन प्रत्यवस्थानं प्रकरणसमा जातिः इति तवोक्तादेव जात्युत्तरत्वेन असदुक्तित्वात् तवैव निरनुयोज्यानुयोगो नाम निग्रहस्थानं स्यात् । ततश्च निर्दष्टेभ्योऽस्मदनुमानेभ्योऽस्माकमभीष्टसिद्धिर्भवत्येव। [५३. भेदस्य अविद्याजन्यत्वनिषेधः।] किं च। द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ __(मुण्डकोपनिषत् ३-१-१) इत्यादिश्रुत्या एकैकस्मिन् शरीरे द्वौ द्वावात्मानौ निरूपितौ। तथा श्रुत्या सकलशरीरेष्वेकात्मसाधनं प्रवाध्येत । अथ मतम्-अविद्योपहितो जीवो मायोपहितो महेश्वर इति एकैकस्मिन् शरीरे एकैको जीवात्मा सुखअतः आकाश में एकत्व, नित्यत्य, निरवयत्व, व्यापकत्व, अमर्तत्व आदि संभव नही हैं। इसी वेदवचन से आत्मा का कारणरहित, कार्यरहित, निरवयव द्रव्य, तथा द्रव्यारम्भक द्रव्य होना भी बाधित होता है अतः इन कारणों से भी आत्मा को एक सिद्ध करना संभव नही। तात्पर्य - आत्मा के अनेकत्व के विरोध में किसी अनुमान को सिद्ध नही किया जा सकता। ५३. भेद अविद्याजन्य नहीं है -उपनिषद्वचनों से एक एक शरीर में दो दो आत्माओं का अस्तित्व प्रतीत होता है। जैसे कि कहा है - 'दो सहयोगी सखा पक्षी एक ही वक्ष पर बैठते हैं, उनमें एक मीठे पीपल-फल को खाता है तथा दसरा न खाते हुए सिर्फ देखता है।' इस के उत्तर में वेदान्त मत का विवरण इस प्रकार है। अविद्या से उपहित चैतन्य जीव है तथा माया से उपहित चैतन्य महेश्वर १ अनुमानं प्रति पुनः अनुमानं तेन स्वमतस्थापनम् । २ अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगनिग्रहः इति न्यायसारे । ३ द्वौ पक्षिणी सहायौ सखिनौ एकं शरीरं तिष्टतः तयोः परमात्मजीवात्मनोः । ४ अविद्योपाधियुक्तः । ५ मायोपाधियुक्तः ।
SR No.022461
Book TitleVishva Tattva Prakash
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyadhar Johrapurkar
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh
Publication Year1964
Total Pages532
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy