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________________ पद्यानुवाद : - [ द्रुतविलम्बितवृत्तम् ] समभिरूढ़नय प्रतिशब्द से. कह रहा पृथगर्थ विशेष से । कलश कुम्भ घटादि विभिन्न हैं, नहि पुरन्दर इन्द्र समार्थ हैं ।। १५ ।। भावानुवाद : समभिरूढ़नय शब्द के पर्याय से व्युत्पत्तिजन्य अर्थ लगाकर प्रतिपर्याय भिन्न-भिन्न अर्थ मानता है । कुम्भ, कलश और घट तीनों ही पर्याय घट रूप अर्थ में एक ही अर्थ का प्रतिपादन करते हैं; यह समभिरूढ़ नय स्वीकार नहीं करता है । शब्द स्वयं में व्युत्पत्तिजन्य है और व्युत्पत्तिजन्य शब्द प्रत्येक दूसरी व्युत्पत्ति से भिन्नता को अभिव्यक्त करता है । प्रत्येक शब्द अपनी व्युत्पत्ति की मौलिकता रखता है तथा प्रवृत्ति निमित्त के आधार पर भिन्न अर्थ को अभिव्यक्त करता है । समभिरूढ़नय इसी सूक्ष्मता का प्रतिपादन करता है । जो अपने में व्युत्पत्ति से इस अर्थ का द्योतक है " सम् = सम्यक् प्रकारेण शब्दपर्यायेषु निरुक्तिभेदेन ( प्रवृत्तिनिमित्तादिना ) भिन्नमर्थमभिरोहन् समभिरूढ़ः ।" नयविमर्शद्वात्रिंशिका - ४०
SR No.022450
Book TitleNayvimarsh Dwatrinshika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushilsuri
PublisherSushilsuri Jain Gyanmandir
Publication Year1983
Total Pages110
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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