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________________ - सनिबन्धं यश्च जिनयज्ञकल्पमरीरचत् । त्रिषष्टिस्मृतशास्त्रं यो निबन्धालङ्कृतं व्यधात् ॥ १५ ॥ योऽहन्महाभिषेका विधि मोहतमोराविम् चक्रे नित्यमहोद्योतं स्नानशास्त्रं जिनेशिनाम् ॥ १६ ॥ (सागारधर्मामृत टीका ) भावार्थ--रुद्रट कविके 'काव्यालंकार ग्रन्थकी टीका बनाई, अरहंत देवका 'सहस्रनाम - टीकासहित बनाया, जिनयज्ञकल्प सटीक बनाया, त्रिषष्टिस्मृतिशास्त्र ( संक्षिप्त) टीकायुक्त बनाया और नित्यमहोद्योत नामक अभिषेकका ग्रन्थ बनाया, जो भगवान्की अभिषेक पूजाविधि सम्बन्धी अंधकारको नाश करनेके लिये सूर्यके समान है। वि० संवत् १२९६ के पीछे बने हुए ग्रन्थों के नाम | अनगारधर्मामृतकी टीकामें इस प्रकार मिलते हैं: राजीमतीविप्रलम्भं नाम नेमीश्वरानुगम् । व्यधात्त खण्डकाव्यं यः स्वयंकृतनिबन्धनम् ॥ १२ ॥ आदेशापितुरध्यात्मरहस्यं नाम यो व्यधात् । शास्त्रं प्रसन्नगम्भीरं प्रियामारब्धयोगिनाम् ॥ १३ ॥ रत्नत्रयविधानस्य पूजामाहात्म्यवर्णकम् । रत्नत्रयविधानाख्यं शास्त्रं वितनुतेस्म यः ॥ १८ ॥ (अनगारधर्मामृत टीका ) १. यह भी सोनागिरके भंडारमें है । २. आशाधरकृत मूल सहस्रनाम प्रायः सब जगह मिलता है। बुन्देलखंडमें प्रायः इसी सहस्रनामका प्रचार है । ३. नित्यमहोद्योत बम्बईके भंडारमें है।
SR No.022362
Book TitleSagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pandit, Lalaram Jain
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1915
Total Pages362
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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