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________________ १३२ श्रावकप्रज्ञप्तिः [ २१८ त्वेन । अभुक्त्वा सर्वमननुभूय निरवशेषम् । अपूर्वकरणयोगात् क्षपकश्र ण्यारम्भकादपूर्वकरण - संबन्धात् । प्राप्नोति मोक्षमेवासादयति निर्वाणमेव । कि तेन व्यापादक भावनिबन्धनत्व परिकल्पि तेन कर्मणेति ॥ २१७॥ स्यात्तस्मिन् सति न चरणभाव एवेति । अत्राह परकय कम्मनिबंधा चरणाभावमि पावइ अभावो । सकयस्स निष्फलत्ता सुहदुहसंसारमुक्खाणं ||२१८॥ परकृतकर्मनिबन्धाद्वयापाद्य कृतकर्मनिबन्धनेन व्यापादकस्य चरणाभावे अभ्युपगम्यमाने । प्राप्नोत्यभावः सुख-दुःख- संसार- मोक्षाणामिति योगः । कुतः ? स्वकृतस्य निःफलत्वान्निःफलत्वं चान्यकृतेन प्रतिबन्धादिति ॥२१८॥ अकयागमकयनासा सपरेगतं च पावई एवं । 'तच्चरणाउ च्चिय तओ खओ वि अणिवारियप्पसरो ॥ २१९ ॥ , आदि) प्राणी के हाथ से मारा जाऊँ ।' इस प्रकारके फलयुक्त जिस कर्मको बांधा था वह अध्यवसाय विशेषसे संक्रमण आदिको प्राप्त होता हुआ उस प्रकारके फलको नहीं भो देता है । अब यहाँ यह कहा जाता है कि वधक प्राणीके द्वारा भो जो चतुर्गंति के कारणभूत अनेक प्रकारके कर्मको बाँधा गया है उसे वह उस रूप में नहीं भी भोगता है और क्षपकश्रेणिपर आरूढ़ होता हुआ अपूर्वकरण परिणामके वश मोक्षको प्राप्त कर लेता है । तात्पर्य यह है कि कर्म चाहे स्वकृत हो या परकृत हो वह जिस रूपमें बाँधा जाता है, अध्यवसाय विशेष के वश वह अपकर्षण, उत्कर्षण और संक्रमणादि रूप अवस्थान्तरको प्राप्त होता हुआ उस प्रकारके फलको नहीं भो देता है । ऐसी परिस्थितिमे जो वधको विरति करायी जाती है वह निरर्थक न होकर प्राणोके लिए हितकर ही है, ऐसा निश्चय करना चाहिए || २१७|| परकृत कर्मके वश चारित्र के अभाव में क्या अनिष्ट हो सकता है, इसे आगे स्पष्ट किया जाता है परकृत- वध्य प्राणीके द्वारा किये गये - कर्मके कारण वधकके चारित्रका अभाव माननेपर स्वकृत कर्मके निष्फल हो जानेसे सुख, दुख, संसार और मोक्षके अभावका प्रसंग प्राप्त होगा । विवेचन -- अभिप्राय यह है कि मारणोन्मुख प्राणीने अमुक प्राणीके निमित्तसे मारे जानेरूप जिस कर्मको बांधा है उसके प्रभावसे यदि दूसरेके – उसके मरने में निमित्त बननेवाले वधक के — वधको विरतिरूप चारित्रका प्रतिबन्ध होता है तो वैसी अवस्था में उसके स्वकृत कर्मके निष्फल हो जाने से सुख, दुख, संसार और मोक्ष आदिके अभावका भी प्रसंग दुर्निवार होगा । इससे यही सिद्ध होता है कि प्राणो स्वकृत कर्मके अनुसार हा यथासम्भव सुख-दुख आदिका उपभोक्ता होता है, न कि परकृत कर्मके वशीभूत होकर, अन्यथा उपर्युक्त अनिष्टका प्रसंग अनिवार्यं प्राप्त होगा ||२१८|| उपर्युक्त मान्यता में जो अन्य दोष सम्भव हैं उन्हें भी आगे प्रकट किया जाता है इस प्रकारसे - परकृत कर्मके प्रभावसे - चारित्रका लोप होनेपर अकृतागम व कृतनाश दोषोंके साथ स्त्र और परमें अभेदका भो प्रसंग प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त उसके चारित्रसे ही - वध्यके चारित्रसे ही - वधक के कर्मक्षय भी बे-रोक-टोक हो सकता है । १. अ तच्चरणउ च्चिय तर खउ अणि ।
SR No.022026
Book TitleSavay Pannatti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHaribhadrasuri, Balchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages306
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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