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________________ २७४ दानशासनम् द्वारावती तो अशुभ तैजसऋद्धिप्राप्त उस मुनिके द्वारा ही जलगई । और कृष्णचंद्रका मरण भी उसी जलविष्णुके द्वारा ही हुआ। अंतरायका वैचित्र्य लोक में प्रसिद्ध है, वह फल दिये विना नहीं छोड सकता । लोकमें यह उक्ति प्रसिद्ध ही है किं विनाशकाल में मनुष्यको विपरीत बुद्धि सूझा करती है । मनुष्य चाहता है कुछ, होता है और कुछ, सब कुछ विधिविलसित हुआ करते हैं । उससे अघटित घटना विघटित होती है । इसप्रकार विचार कर मनुष्यको सदा शुभ आचरण में प्रवृत्ति करनी चाहिये ।। २५२-२५३ ॥ मतं समस्तै ऋषिभिर्यदाईतेः प्रभासुरं पावनदानशासनम् । मुदे सतां पुण्यधनं समर्जितुं धनानि दद्यान्मुनये विचार्य तत् ॥ २५४ ॥ अर्थ- समस्त आईत ऋषियोंके शासन के अनुसार यह दानशासन प्रतिपादित है । इसलिए पुण्यधनको कमाने की इच्छा रखनेवाले दानी श्रावक उत्तम पात्रोंको देखकर उनके संयमोपयोगी धनादिकद्रव्योंको विचार कर दान देवें ॥ २५४ ॥ इति करणत्रयलक्षणलक्षिताहारदानविधिः *
SR No.022013
Book TitleDan Shasanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherGovindji Ravji Doshi
Publication Year1941
Total Pages380
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size27 MB
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