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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir हिरन्नसुवनपमाणाइक्कमे दुपयचउप्पयपमाणाइक्कमे कुवियपमाणाइक्कमे ॥४१॥ सूत्र.) (६९) दिसिवए तिविहे पत्रत्ते उड्ढदिसिवए अहोदिसिवए तिरियदिसिवए दिसिवयस्स समणोवासएण इमे पंच अइयारा जाणियव्वा तं जहा उड्ढदिसिपमाणाइक्कमे अहोदिसिपमाणाइक्कमे तिरियदिसिपमाणाइक्कमे खित्तुवुड्डी सइअंतरद्धा ॥४२॥ सूत्र.60 (७०) उवभोगपरिभोगवए दुविहे पन्नते तंजहा भोअणओ कम्मओ अ, भोअणओसमणोवासएणं इमे पंच अइयारा जाणियव्या तं जहा-सचित्ताहारे सचित्तपडिबद्धाहारे अपालिओसहिभक्खणया तुच्छोसहिमक्खणया दुष्पलिओसहिमक्खणया ॥ ४३॥ सूत्र. 71 ___ (७१) कम्मओ णं समणोवासएणं इमाई पत्ररस कम्मादानाई जाणियव्वाइं तं जहा इंगालकम्मे वणकम्मे साडीकम्मे भाडीकम्मे फोडीकम्मे दंतवाणिज्जे लक्खवाणिजे रसवाणिजे केसवाणिजे विसवाणिजे जंतपीलणकम्मे निलंछणकम्मे दवग्गिदावणया) सरदहतलायसोसणया असईपोसणया ॥४४॥ सूत्र.71 (७२) अनत्थदंडे चविहे पनत्ते तं जहा अवझाणारिए पमत्तायरिए हिंसम्पयाणे पावकम्मोवएसे अनत्थदंडवेरमणस्स समणोवासएणं इमे पंच अइयारा जाणियव्वा तं जहा कंदप्ये कुक्कुइए मोहरिए संजुताहिगरणे उवभोगपरिभोगाइरेगे ॥४५॥ सूत्र.80/ (७३) सामाइयं नामं सावजजोगपरिवजणं निरवजजोगपडिसेवणं च ॥४६-१॥ पू. सागरजी म. संशोधित ||श्रीआवश्यक सूत्र For Private And Personal Use Only
SR No.021042
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Shwetambar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurnachandrasagar
PublisherJainand Pustakalay
Publication Year2005
Total Pages33
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size7 MB
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