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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir त्रयस्त्रिंशःस्तम्भः। तथा पूजासारनामा जिनसंहितामें ऐसें लिखा है.॥ समृद्धिभत्त्या परया विशुधा कपूरसंमिश्रितचंदनेन ॥ जिनस्य देवासुरपूजितस्य सुलेपनं चारु करोमि मुक्त्यै ॥१॥ भावार्थ:-अपनी समृद्धिपूर्वक परमविशुद्ध भक्तिसें मिश्रितचंदनकरके देवअसुरादिकोंसे पूजित ऐसें जिनको मुक्तिकेवास्ते भला लेपन करता हूं. तथा त्रिवर्णाचारमें ऐसें लिखा है. ॥ जिनांघ्रिचंदनैः स्वस्य शरीरे लेपमाचरेत् ॥ यज्ञोपवीतसूत्रं च कटिमेखलया युतम् ॥ १॥ जिनांघ्रिस्पर्शितां मालां निर्मले कंठदेशके ॥ ललाटे तिलकं कार्य तेनैव चंदनेन च ॥ २॥ भावार्थ:-जिनमूर्तिके चरणकमलके चंदनसें अपने शरीरको लेप करे, और कटिमेखला ( कंदोरा-तरागडी ) संयुक्त यज्ञोपवीत अपने शरीरऊपर धारण करे; । तथा जिनमूर्ति के चरणोंको स्पर्शी हुई मालाको अपने कंठमें धारण करे, तथा अपने ललाटऊपर तिसही चंदनसें तिलक करे.॥ तथा पूजासारमें ऐसें लिखा है.॥ ब्रह्मनोथवा गोनो वा तस्करः सर्वपापकृत् ॥ जिनांध्रिगंधसंपोन्मुक्तो भवति तत्क्षणम् ॥ १॥ __ भावार्थः-जो ब्रह्मघाती, तथा गोघाती, तथा तस्कर-चौर, तथा सर्व पापोंके करनेवाला पुरुष है, सो भी, जिनेंद्रके चरणोपरि लगे हुए गंधके स्पर्शसें, अर्थात् तिस गंधको भक्तिपूर्वक अपने शरीरको लगानेसें, तरक्षण शीघ्रही पूर्वोक्त पापोंसे मुक्त होता है-छूट जाता है.॥ तथा श्रीपालचरित्रमें ऐसें लिखा है. दिवसाष्टकपर्यंतं प्रपूजय निरंतरम् ॥ पूजाद्रव्यैर्जगत्माएष्टभेदैर्जलादिकैः ॥ १॥ For Private And Personal
SR No.020811
Book TitleTattva Nirnayprasad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVallabhvijay
PublisherAmarchand P Parmar
Publication Year1902
Total Pages863
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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