SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 475
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ___ अन्वयार्थ:-(अणुगच्छमाणे) अनुगच्छन् सत्या सन्यामषेति भाषाद्विकमाश्रित्य उपदेशं कुर्वतो मुनेर्वचनमनु परन् कश्चिद् मन्दाधिकारी 'वितह' वितथं विपरीतमेव अन्यथैव (विजाणे) विजानीयात्, तं सम्यगर्थ मनव गच्छन्नं मन्दाधि. कारिणम् 'तहा तहा' तथा तपा-तेन तेन प्रकारेण हेतु दृष्टान्तादिकथनप्रकारेण (साहु) साधुः (अकक्कसेणं) अकर्कशेन कोमलवचनेन उपदिशेत् येन स सम्यग. वगच्छेत् मोऽयमितिकृत्वा तं नापमानयेत् (ण कस्थइ भास) न कत्थयेद् भाषाम् अधिकारीको 'तहा तहा-तथा तथा' उस उस प्रकारसे-हेतुदृष्टात आदि के कथन प्रकार से 'साहु साधुः साधु 'अकक्कसेणं-अकर्कशेन' कोमल वचन से उपदेशकरे 'ण कत्था भासं-न कत्ययेत् भाषाम्' नेत्र भंग के विकारसे प्रश्न कर्माके मन में कुछ भी पीडा उत्पन्न न करे तथा 'ण विहिंसइन्जा-न विहिस्यात' उसका तिरस्कार भी न करे तथा 'निरुद्धगंवावि-निरुद्धवापि' अल्पाको 'ण दीहइज्जा-न दीर्घयेदृ' दीर्घ. वाक्यसे कथन न करे ॥२३॥ अन्वयार्थ-सत्या मृषा 'जो सत्य है और झूठ नहीं है' रूप द्वितीय भाषा व्यवहार द्वारा उपदेश करने वाले मुनि के वचन का अनुसरण करता हुआ जो कोई मन्द अधिकारी पुरुष वितथ याने असत्य को विपरीत ही समझने लगता है । उस सम्यक् अर्थ को नहीं जानने वाले मन्दाधिकारी को उस उस तरीका से हेतु दृष्टान्तादि कथन पूर्वक कोमल वचन द्वारा साधु उपदेश करे जिससे वह मन्दाधिकारी उसको सम्यग्रूप से समझ जाय 'यह मूर्ख है' ऐसा समझ कर उसको अपत त ४२थी-हेतु टांत विगैरेन। ४५न २थी 'साहु-साधुः' साधु 'अक कसेणं-अकर्कशेन' म क्यनी ७५४॥ ४२ ‘ण कथइ-भास-न कत्थयेत् भाषाम्' नेत्र सतना विजयी प्रताना मनमा ४७ ५५४ पी Gurt नरे तथा ‘ण विहिं सइज्जा-न विहिस्यात्' ते ति२२४॥२ ५५५ । ४३ तथा 'निरुद्धग वाषि-निरुद्ध वापि' ५६५२ ‘ण दीहइज्जा-न दीर्घयेत् ' मा કથન ન કરે ર૩. अन्वयार्थ-सत्याभूषा (२ सत्य छ भने नथी) ३५ मी० ०44. હાર ભાષા દ્વારા ઉપદેશ કરવાવાળા મુનિના વચનનું અનુસરણ કરતા થકા જે કોઈ મંદ અધિકારી પુરૂષ વિતથ અર્થાત્ અસત્યને વિપરીત જ સમજે છે, એ સમ્યક્ અથને ન જાણવાવાળા મંદાદિકારીને એ તરકીબથી હેતુ દૃષ્ટાંત વિગેરે કથન પૂર્વક કેમલ વચન દ્વારા સાધુ ઉપદેશ કરે. જેથી એ મંદાધિકારી તેને સમ્યફ પ્રકારથી સમજી જાય “આ મૂર્ખ છે એવું સમજીને તેને For Private And Personal Use Only
SR No.020780
Book TitleSutrakritanga Sutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherJain Shastroddhar Samiti
Publication Year1970
Total Pages596
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy