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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir मयार्थबोधिनी टीका प्र. शु. अ. ५ उ. १ नारकीयवेदना निरूपणम् ३४७ बैतरिणी - क्षारोष्णरुधिराकार जलनदी (ते सुया) त्वया श्रुता (ते) ते नारका जीवाः : ( उसुचोइया) इषुनोदिता शरेण प्रेरिताः (सत्तिसु इम्प्रमाणा) शक्ति हन्यमाना:शक्तिभिईन्यमानाः ( अभिदुग्गां वेयरणि) अभिदुर्गा वैतरणी ( वरंति) तरन्ति नद्यां पतन्तीति ॥८॥ - टीका -- सुधर्मस्वामी जंबुस्वामिनं पति कथयति हे जंत्रः भगवता तीर्थकरेण प्रतिपादिता या वैतरणी, तस्या नाम मायो भवद्भिः श्रुतमेव। णिसिओ खुर इव' निशितः क्षुर इव वीक्ष्णो यथा क्षुरधारः तद्वत् । 'विक्खपोया' तीक्ष्णस्रोताःतीक्ष्णानि शरीरविदारकानि स्रोतांसि यस्याः सा तीक्ष्णस्रोताः स्पर्शमात्रेण शीरविदारक स्रोतोयुक्ता 'जर ते सुवा' यदि स्वया श्रुता 'मिदुग्गा' अभिदुर्गा अति शयेन दुःखेन तत्तु योग्या 'वेयरणी' वैतरणी-क्षारोष्णरुधिरपूयजलवाहिनी नदी 'ते' ते नारकाः जीवाः अविशतिततांगारसदृशों भूमिं विहाय पिपासाकुळिता: पिपासामपनेतुम् 'अभिदुग्गां वेयरिज' अभिदुर्गा वैतरिणीम् अतिमीमां तां जल वाली है। नारक जीवों को बाणों से प्रेरित होकर तथा शक्तियों ( भाला वगैरह शस्त्रों) से आहत होकर उस दुर्गम वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है, उसमें गिरना पड़ता है ||८|| टीकार्थ- सुधर्मा स्वामी जम्बू स्वामी से कहते हैं- हे जम्बू । तीर्थकर भगवान् के द्वारा प्रतिपादित वैतरणी नदी का नाम शायद तुमने सुना होगा । जैसे छुरा की धार तीखी होती है, उसी प्रकार उसकी धारा भी तीखी है उसके स्रोत स्पर्श होते ही शरीर को विदारण कर देने वाले हैं। वह क्षार, उष्ण, रुधिर एवं पीव रूप जल से युक्त है. और अतिशय दुर्गम है । उसे पार करना बहुत कठिन है। वे नारक जीव अतितप्त अंगार सदृश भूमि को छोडकर, प्यास से व्याकुल होकर જેવા જળથી યુક્ત છે, નારક જીયેાને માણા, ત્રિશુળ અને ભાલાં આદિથી પ્રેરાઈને દુમ નદી પાર કરવી પડે છે. ૫ટા ટીકા-સુધાં સ્વામી જયૂ સ્વામીને કહે છે હું જ મૂ! તીથંકર ભગવાન દ્વારા પ્રતિપાદ્રિત વૈતરણી નદીનું નામ તે તે... કદાચ સાંભળ્યું હશે, અસ્તરાની ધાર જેવી તીખી (ત'ક્ષ્ણુ) હેાય છે, એવી જ વૈતરણીની ધારા તીખી છે–તેને પાર કરવાના પ્રયત્ન કરનાર વ્યક્તિના શરીરનું તેના તીક્ષ્ણુ પ્રવાહ દ્વારા વિદ્યારણ કરાય છે. કાતરની જેમ તે નદીનેા પ્રવ.હુ શરીરને વેતરી नांचे छे, तेथी ४ तेतुं नाम वैतरणी पड्युं छे. ते नहीं क्षार, रुधिर, पाय પરુ આદિથી યુક્ત ઉષ્ણુ જળવાળી છે, અને તેને પાર કરવાનું કામ ઘણ For Private And Personal Use Only
SR No.020779
Book TitleSutrakritanga Sutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherJain Shastroddhar Samiti
Publication Year1969
Total Pages729
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size14 MB
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