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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir श्रमण-सूत्र निगामसिजाए - बार-बार चिर- स सरक्खामोसे-सचित्त रज से युक्र काल तक सोने से वस्तु को छूते हुए उव्वट्टणाए = करवट बदलने से पाउलमाउलाए, आकुल व्यापरिवट्टणाए = बार-बार करवट कुलता से बदलने से सोश्रणवत्तियाए = स्वप्न के निमित्त श्राउटणाए - हाथ पैर श्रादि को संकुचित करने से इत्थी विप्परियासियाए-स्त्री संबंधी पसारणाए - हाथ पैर आदि को ___विपर्यास से फैलाने से दिदि विप्परियासियाए = दृष्टि के छप्पइय = षटपदी यूका आदि विपर्यास से मणविप्परियासियाए = मन के सघट्टणाए = स्पर्श करने से विपास से कूइए - खांसते हुए पाणभोयण - पानी और भोजन के कक्कराइए = शय्या के दोष कहते विप्परियासियाए = विपर्यास से जो यदि कोई छीए - छींकते हुए मे मैंने जंभाइए = उबासी लेते हुए देवसिश्रो = दिवस सम्बन्धी अामोसे विना पूँजे स्पर्श करते अइयारो : अतिचार कत्रो = किया हो तो व विपर्यास का अर्थ विपर्यय है। स्वप्न में स्त्री के द्वारा ब्रह्मचर्य की भावना में विपर्यय हो जाना, स्त्री विपर्यास है। जिनदास महत्तर कहते हैं-'विपर्यासो अबभचेरं । परन्तु केवल अब्रह्मचर्य ही नहीं, किसी भी प्रकार की सयमविरुद्ध वृत्ति या प्रवृत्ति विपर्यास है। आगे मनोविपर्यास और पानभोजनविपर्यास आदि में यही अर्थ ठीक बैठता है । स्त्री साधक 'इत्थी विप्परियासियाए' के स्थान में 'पुरिसवियरियासियाए,' पढ़े। उनके लिए, पुरुष ही विपर्यास का निमित्त है। For Private And Personal
SR No.020720
Book TitleShraman Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarchand Maharaj
PublisherSanmati Gyanpith
Publication Year1951
Total Pages750
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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