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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 160 पवित्रभाव,विशुद्धपरिणाम । (मो.४५, निय.१४६) णिम्मह पुं निर्मथ] दुर्दम्य, विनाश । (भा.९३) णिम्माण वि [निर्मान] मान रहित, मार्दव युक्त। (निय.४४, बो.४८) णिम्मिविय वि [निर्मापित] निर्मित, रचित, बनाया हुआ। (बो.१२) हिम्मूढ वि [निर्मूढ] अज्ञानता रहित, ज्ञानयुक्त। (निय.४३) णिम्मोह वि [निर्मोह] मोह रहित, आसक्ति रहित। (निय.७५, प्रव.९०, चा.१६, बो.१) णिय वि [निज] स्वकीय, आत्मीय। -अप्प पुं [आत्मन्] निजात्मा। (मो.६३) -कज्ज न [कार्य] अपना प्रयोजन, अपना कार्य। णियकज्ज साहए णिच्चं । (निय.१५५)-गुण पुं न [गुण] निजगुण आत्मा के गुण। [नि+वृत्] दूर रखना, पीछे हटाना, छुड़ाना। (स.३८३, ३८४) णियत्त न [निवृत्त] निवृत्ति, त्याग, दूर, अलग। (सू.२७) इच्छा जा हु णियत्ता, ताह णियत्ताई सब्बदुक्खाई। णियत्ति स्त्री [निवृत्ति] त्याग। (निय.६७) अलीयादिणियत्तिवयणं वा। णियद वि [नियत] नियमबद्ध, नियमानुसारी, निश्चित। (पंचा.४) अत्थित्तम्हि य णियदा। (पंचा.१००) णियदय वि [नियतय नियत, निश्चित। (प्रव.४४) । णियदिणा वि [नियतिन] नियमपूर्वक। उदयगदा कम्मंसा For Private and Personal Use Only
SR No.020450
Book TitleKundakunda Shabda Kosh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaychandra Jain
PublisherDigambar Jain Sahitya Sanskriti Sanskaran Samiti
Publication Year
Total Pages368
LanguageSanskrit
ClassificationDictionary
File Size9 MB
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