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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir मोक्षमार्ग में प्रवर्तते हुए जीव को स्नेह, वज की सांकल के समान है, क्यों कि स्नेह के कारण ही प्रभु महावीर के जीतेजी गौतमस्वामी को केवलज्ञान पैदा न हुआ । फिर प्रातःकाल होने पर इंद्रादि देवों ने महोत्सव किया । यहां पर कवि कहता है “अहंकारोऽपि बोधाय, रागोऽपि गुरूभक्तये । विषादः केवलायाभूतु, चित्रं श्री गौतमप्रभोः" ||1|| गौतम प्रभु का सब कुछ आश्चर्यकारक मैं ही हुआ, उनका अहंकार उल्टा बोध के लिए हुआ, राग भी गुरूभक्ति के लिए हुआ और विषाद केवलज्ञान के लिए हुआ !!! श्री गौतमस्वामी बारह वर्ष पर्यन्त केवलिपर्याय को पाल कर और सुधर्मास्वामी को दीर्घाय जानकर गण सौंप कर मोक्ष सिधारे । फिर सुधर्मस्वामी को भी केवलज्ञान प्राप्त हुआ और वे भी उसके बाद आठ वर्ष तक विचर कर आर्य जंबूस्वामी को अपना गण सौंपकर मोक्ष पधारे । जिस रात्रि में श्रमण भगवान् श्रीमहावीरस्वामी मोक्ष गये, यावत् सर्व दुःखों से मुक्त हए उस रात्रि को नवॐ मल्लकी जाति के काशी देश के राजा तथा नव लछकी जाति के कोशल देश के राजाओं का किसी कारण वहान पर संमिलन था । वे अठारह ही चेड़ा राजा के सामन्त कहलाते थे । उन्होंने उस अमावस्या के दिन संसार रूप समुद्र से पार करनेवाला उपवास पौषध व्रत किया हुआ था । अब संसार से भाव उद्योत चला गया अतः हम द्रव्य उद्योत करेंगे यह विचार कर उन्होंने दीपक जलाये । उस दिन से दीवाली का महोत्सव प्रचलित For Private and Personal Use Only
SR No.020429
Book TitleKalpasutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipak Jyoti Jain Sangh
PublisherDipak Jyoti Jain Sangh
Publication Year2002
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Paryushan, & agam_kalpsutra
File Size18 MB
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