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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra दीवा० व्याख्या ० ॥ ४० ॥ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir राजाने पूछा ब्राह्मण बोला हे लोकनाथ कलियुग में पापरूप शिला धर्मरूप वालाग्र से टिरतीभई रहेगी ॥ जब धर्मरूप बाल टूटेगा तब समकालमनुष्य संसारसमुद्र में डूबेंगे राजा आगेचले फलकेवास्ते वृक्षकोपीड़ाकरते हुए लोग देखे || ब्राह्मणसेपूछा ब्राह्मण वोला कलियुगमें पिता पुत्रः फलकेवास्ते वृक्षसरीखा कष्टसहेगा || राजा आगे चले एक सोने के कड़ाह में मांसपचताभयादेखा ॥ ब्राह्मणसे पूछा ब्राह्मण वोला अपनाहितकरनेवाला कुटुम्बको लोग | छोड़ेगा और लोगों केसाथ मैत्री करेंगे उत्तम लोगोंका परिचयनहीकरेंगे नीचका परिचय करेंगे | राजा आगेचले लोग सर्पको पूजते हैं गरुड़को नहीं पूजते ॥ ब्राह्मणसे पूछा ॥ ब्राह्मण बोला दयारहित अधर्मी लोग सर्पतुल्य उन्हों का बहुत लोग आदर सत्कार करेंगे || गरुड़के सदृश गुणवान उत्तमधर्मज्ञपुरुषोंकी निंदा करेगें ॥ राजा आगेचले ॥ एक गाड़ीके हाथी जोड़े हुएदेखे और एक गाड़ीके गधेजोड़े हुए देखे || उन्होंमें हाथी परस्पर नहीं मिलते हुए चलें और गधे परस्पर मिलते हुए चलें ऐसा देख के ब्राह्मणसे पूछा ब्राह्मणबोला कलियुग में उत्तमकुलके लोगपरस्पर विरोध ओर ईर्षा करेंगे | और नीच कुलके लोग नीतिः से चलनेवाले परस्पर स्नेहयुक्त होवेंगे ॥ प्रायः नीच कुल में उत्पन्न भये राजा होवेंगे ॥ हाथीके सरीके उत्तमकुलमें उत्पन्न हुए दासहोवेंगे अन्यदा पांचपांडव वनवासमें रहेथे ॥ तब युधिष्ठिरराजा चारभाइयों को रात्रिः के चारप्रहर में पहरेपररक्खा | पहले पहर में भीम जागता है चारभाई सोते हैं । तब कलि| रूप पिशाच आके बोला भो भीम म तेरेभाइयों को मारूंगा तब भीमक्रोधातुरहोकर कलिपिशाचको मारनेको ॥ For Private and Personal Use Only पंचम आरेका स्वरूप ॥ ४० ॥
SR No.020325
Book TitleDwadash Parv Vyakhtyana Bhashantaram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinduttsuri Gyanbhandar
PublisherJinduttsuri Gyanbhandar
Publication Year1926
Total Pages180
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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