SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 146
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ADMAAVAILAnyoneRAMRIDAmoenomma अमलोनी १३५ अमान्य अमलोनी-संज्ञा, स्त्री० दें. (सं० अम्ल "तौलौं तब द्वार पै अमानत परो रहो" रत्नाकर। लोणी ) नोनिया घास, नोनी, लोनिया ।। प्रमहर--संज्ञा, पु० दे० ( हिं० ग्राम ) छिले अमानतदार-~-संज्ञा, पु. ( अ०) जिसके पास अमानत रखी जावे, अमानत रखने हुए कच्चे ग्राम की सुखाई हुई फांके, वाला। श्रमचुर । अमहल -संज्ञा, पु० (सं० अ-महल अ० ) | अमानतन-कि० वि० ( अ० ) धरोहर या बिना घर-द्वार का, जिसके रहने का कई अमानत के तौर पर, थाती के समान, या स्थान न हो, व्यापक । रूप में। अमा --संज्ञा, स्त्री० (सं० ) अमावस्या की माप-वि० (सं० अ+माप ) जिसकी कला, घर, मर्त्य लोक, अमावस । माप या तौल न हो सके, अपरिमाण, अमार्ग--संज्ञा, पु० (सं० ) कुमार्ग, मार्ग अतुल । वि० अमापित । या पथ-विहीन, बेरास्ता, कुपथ, विपथा वि० श्रमापनीय- अतुलनीय । अमारग (दे० )। अमाना-अ. क्रि० ( सं० श्रा-+मान ) अमातना -- स० क्रि० (सं० श्रामंत्रण ) पूरा पूरा भरना, समाना, अटना, फूलना, आमंत्रित करना, निमंत्रण या न्योता देना । इतराना, गर्व करना, अवाना ( दे० )। अमात्य-संज्ञा. पु० (सं) मंत्री, वज़ीर, दे० अ० कि० समाना। दीवान, फर्जी। अमानी-वि० (सं० अमानिन् ) निरभिमानी, "सदानुकूलेप्विह कुर्वतेरति नृपेवमात्येषु च निरहंकारी, घमंड-रहित ।। सर्व संपंदा'' --- किरात । संज्ञा, स्त्री. ( सं० अात्मन् ) वह भूमि श्रमाता-वि० दे० (अ+ माता मत ) अप्र- | जिसका ज़मीदार सरकार या गवर्नमेंट हो, मत्त, जो मस्त या मतवाला न हो, खाप, वह भूमि या कार्य जिसका प्रबंध (अ+माता) बिना माता का, माता-रहित, अपने हो हाथ में हो, फसल के विचार से क्रि० स० ( अमाना--दे० ) समाता। रियायत किए हुए लगान की वसूली। अमान-वि० (सं०) जिसका मान या संज्ञा, स्त्री० ( अ--मानना ) अपने मन की अंदाज़ न हो, गर्व-रहित, अपरिमित, बेहद, कोररवाई, अंधेर, मनमानी । बहुत, निरभिमान, सीधा-सादा, अप्रतिष्टित, | " बालकसुत सम दास अमानी "अनाहत, तुच्छ । रामा०। 'पास-पास भूपतिन के बैठे तनय अमान” | अमानुष-वि० (सं० ) मनुष्य की सामर्थ्य -सुजा० । के बाहर, मनुष्य-स्वभाव के विरुद्ध, पाशव, "दुहँ दिसि दीसत दीप अमाना' ... रामा। पैशाचिक, अलौकिक । कविगन को दारिद-द्विरद, याही दल्यो संज्ञा, पु० मनुष्य से भिन्न प्राणी, देवता, श्रमान"- भू० । राक्षस, जो मनुष्य न हो। संज्ञा, पु० (अ० ) रक्षा, बचाव, शरण, अमानुषी-- वि० (सं० अमानुषीय ) मनुष्यपनाह । स्वभाव के विरुद्ध, पाशव, पैशाचिक, मानवअमानत-संज्ञा, स्त्री० (अ० ) अपनी वस्तु शक्ति से परे या बाहर की बात ।। किसी दूसरे के यहाँ कुछ काल के लिये | अमान्य- वि० ( सं० ) मान-रहित, त्याज्य, रखना, धरोहर, थाती। । अनावृत्य, अस्वीकार, न मानने के योग्य, For Private and Personal Use Only
SR No.020126
Book TitleBhasha Shabda Kosh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamshankar Shukla
PublisherRamnarayan Lal
Publication Year1937
Total Pages1921
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size51 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy