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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kcbatrth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir सुत्रम ॥७१४॥ दाननी निंदा करे तो दान लेनारनी वृत्तिनो छेद करे छे. आचा० तेथी ते दान तथा कुवा तळाव संबंधी विधि निषेधमां मध्यस्थ भाव राखीने यथावस्थित शुद्ध दाननी प्ररुपणा करे, तथा । Pसावद्य अनुष्ठानन स्वरुप बतावे, (के आ पाप न करवां नंइए.) आ प्रमाणे उपयोग राखी बालनारों साधु बन्ने दोषने त्यागनारो ॥७१४|| | जीवोने आश्वास भूमि आफ्नारो थाय छे. आ बाबनने दृष्टांतथी समजावे छे. के पूर्वे बतावेल असंदीन द्वीप (भरतीना पाणीथी न डुबतो) शरण रुप थाय छे. तेम आ महामुनी जीवोना रक्षणनो उपाय बताववाथी मारनारा जोवोना रक्षा करनार तथा मरनार हिंस कने तेना पापी विचारथी बचाववाथी विशिष्ट गुण स्थान मेळववाथी शरण लेवा योग्य थाय छे. ते कहे छे.(पूर्वे कह्या प्रमाणे विसधिए जे धर्म कथाने कई, ने केटलाक जोबोने दीक्षा अपावे छे. केटलाकने श्रावको बनावे छे. केटलाकने सम्यग्दर्शनवाळा करे छे, Mअने केटलाकने मिथ्यात्वथी हठावी भद्र परिणामवाळा बनावे छे.. -केवा गुणवाळो आ साधु द्विप माफक शरण योग्य थाय छे ? उ०-हवे पछी कहेवाता भाव उत्थानवडे संयम अनुष्ठान करतो उत्कृष्टथी तैयार होय; तथा ज्ञानादिकरुप मोक्षना मार्गमा स्थित होय तथा स्नेह रहित होय तथा रागद्वेष छोडवाथी अप्रतिबद्ध होय, तथा परिसह उपसर्गमां चलायमान न थाय, माटे अचळ छे. अने एक जग्याए पडी न रहेतां योग्य विहार करवाथी चल पण छे तथा संयमथी जेनी लेश्या [अध्यवसाय] बहार न होय, ते । अबहिर्लेश्यावाळो कद्देवाय. एवो मुनी बधी रीते संयम अनुष्ठानमा वर्ते. पण कोइ जग्याए फसाय नहि, प्र. ते शा माटे संयम अनु-१ धानमा वर्ते 'संरव्याय' एटले शोभन धर्मने विचारी अविपरीत दर्शन [दृष्टि]वाळो थाय अथवा सदनुष्ठानरुप दृष्टिवाळो [दृष्टिमान] AAAA5% For Private and Personal Use Only
SR No.020011
Book TitleAcharanga Stram Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilankacharya
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1934
Total Pages186
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size10 MB
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