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________________ परित्तजीव 624 - अभिधानराजेन्द्रः - भाग 5 परिमाए परित्तजीव पु० (परीतजीव) प्रत्येकजीवे, "जस्स जीवरस भग्गस्स, समो २उ० भंगो य दिस्सए। परित्तजीओ से मूले, जेयावन्ने तहाविहे // 1 // " बृ०१ | परिपोसिज्जंत त्रि० (परिपोष्यमाण) उपचीयमाने, पं० सू०१ सूत्र। उ०२ प्रक०। परिप्पवंत त्रि० (परिल्पवत्) परिप्लवने, पाइ० ना० 267 गाथा। परित्तजोणि पुं० (परीतयोनि) परीता योनिर्यस्य स परीतयोनिः। प्रत्येक- | परिप्पुय वि० (परिप्लुत) आप्लुते, स्था० 4 ठा०४ उ०। जीवे, नि० चू०१ उ०। परिप्पुथा स्त्री० (परिप्लुता) घृताऽऽदिभिः परिप्लुतभोजनः परिप्लुत एव परित्ततिग न० (परीतत्रिक) प्रत्येकस्थिरशुभाऽख्ये प्रत्येकत्रिके, कर्म० तं कृत्वा परिप्लुतयित्वा सुहस्तिनो रङ्कवत्या सा तथोच्यते। प्रव्रज्या२ कर्मः। भेदे, स्था० 4 ठा० 4 उ०। परित्तमीसिया स्त्री० (परीतमिश्रिका) प्रत्येकवनस्पतिवनस्पति। संघात- | परिप्फंदपुं० (परिस्पन्द) देशाद्देशान्तरप्राप्तिलक्षणे क्रियाभेदे, सूत्र०१ मनन्तकायिकेन सह राशीकृतमवलोक्य प्रत्येकवनस्पतिरयं सर्वोऽपि श्रु०१ अ०१ उ०। वदति। भाषायाम्, प्रज्ञा० 11 पद। परिफग्गु त्रि० (परिफल्गु) निष्फले, बृ०३ उ०। आ०म०। परित्तसंसारिय पुं०(पीरतसंसारिक) परीतः परिमितः स चासौ संसारः परिफासिय त्रि० (परिस्पृष) व्याप्ते, दश०५ अः 1 उ०। परीतसंसारः, सोऽस्यास्तीति परीतसांसारिकः।"अतोऽनेकस्वराद्" परिभट्ठ त्रि० (परिभ्रष्ट) संसारगर्तायां पतिते, उत्त०७ अ०। // 7 / 2 / 6 / / (हैम०) इतीकणप्रत्ययः / सान्तसंसारे, परिमितसंसारे परिब्भत (देशी) निषिद्धे, भीरौ, च / दे० ना०६ वर्ग 72 गाथा। प्रति०। “दुविहो नेरझ्या पण्णत्ता। तं जहापरित्तसंसारिया चेव, अपरित्त परिब्भमंत त्रि० (परिभ्रमत्) पर्यटति, "एत्थ परिब्भमंतो हु वेप्पं / ' संसारिया चेव / स्था० 2 ठा०२ उ० / प्रा०४ पाद। परिदेवणता स्त्री० (परिदेवनता) पुनः पुनः क्लिष्टभाषणे, स्था० 4 ठा० / परित्भमिय त्रि० (परिभ्रान्त) पर्यटिते, "अणंतखुत्तो समणुभूओ।" 1 उ०। आर्तध्यानलक्षणे, द०। सघा०१अधि०१प्रस्ता०। परिदेविअ त्रि०(परिदेवित) विलपिते, पाइ० ना० 166 गाथा। परिभव पुं० (परिभव) जुगुप्सायाम्, गर्हायाम्, सूत्र० 2 श्रु०२ अ०। परिपास पुं० (परिपार्श्वक) रात्रिक्षेत्ररक्षके, "परिपासउ त्ति छेत्ते, जो परिभवण न० (परिभवन) आभाव्यार्थपरिहारेण न्यक्रियायाम, औ०। पुरिसो सुअइराईए।" पाइ० ना०२१६ गाथा। परिपिंडिय त्रि० (परिपिण्डित) ऐक्यमापादितेषु बहुषु वस्तुषु, आव०३ परिभवणिज त्रि० (परिभवनीय) अनभ्युत्थानाऽऽदिभिः। (ज्ञा०१ श्रु०३ अ० / वन्दनदोषभेदे, न०।"परिपिंडिअं वयणकरणओ वावि। परिपि अ०) अवज्ञायमाने, सूत्र०१ श्रु०२ अ०२ उ01 परिभवविणिवाय पुं० (परिभवविनिपात) पराभिभवसंपर्के, औ०। ण्डितं प्रभूतानां युगपद्वन्दनम् / यद्वा / कुक्ष्योरुपरि हस्तौ व्यवस्थाप्य परिपिण्डितकरचरणस्याव्यक्तसूत्रोचारणपुरस्सरं वन्दनम् / ध०२ परिझुसियसंपन्न पुं० (पर्युषितसंपन्न) पर्युषितं रात्रिपरिवसनं तेन संपन्नः अधि० / आ० चू०। पर्युषितसंपन्न / इदुरिकाऽऽदौ आहारभेदे, ता हि पर्युषितकलनीकृता परिपिहित्ता अव्य० (परिपिधाय) क्षुपित्वेत्यर्थे, आचा०२ श्रु०१ चू०२ आम्लरसा भवन्ति, आरमनास्थिताऽऽम्रफलाऽऽदि वेति। स्था० 4 ठा० अ०३ उ०। 2 उ० परिपीलिअत्रि० (परिपीडित) दुःखिते, निर्गलिते, प्रन० 3 आश्र द्वार। | परिभाईत त्रि० (परिभाजयत) विभज्य ददति, "परिभुजंताणि वा परिपीलिअ अव्य० (परिपीड्य) यूपरुधिराऽऽदिकं निर्गाल्येत्यर्थे, सूत्र० परिभाईताणि विच्छड्डुमाणाणि वा।' आचा०२ श्रु०२ चू०११ अ०। 1 श्रु०३ अ०४ उ०। नि० चू० ज्ञा०। परिपुण्ण त्रि० (परिपूर्ण) अनुपहते, उत्त० 1 अ०। परिभाइजमाण त्रि० (परिभाज्यमान) पार्श्ववर्तिभ्यो मनाग्मनाग दीयमाने, परिपुणिंणदियया स्त्री० (परिपूर्णेन्द्रियता) अनुपहतचक्षुरादि- रा०। आचा० / जी०। करणतारूपे शरीरसंपर्दोदे, स्था०८ ठा०। परिभाइत्ता अव्य० (परिभाज्य) विभागैर्दत्वेत्यर्थे, कल्प० 1 अधि०५ परिपूणग पु० (परिपूणक) घृतक्षीरगालने, सुगृहाभिधानचटका- क्षण। कुलालये, नं०। आ० म०। विशे०। सुगृहाचटिकाविरचिते नीडविशेषे, परिभाव्य अव्य० आलोच्येत्यर्थे, कल्प०१ अधि० 5 क्षण। विशे०। आ० क०। परिभाइय त्रि० (परिभाजित) पूर्वमेव परेभ्यः परिकल्पिते, आचा०२ श्रु० परिपूय त्रि० (परिपूत) गालिते, "दूसपट्टपरिपूर्य घरपट्टगा लितमित्यर्थः। / 1 चू०२ अ०३ उ०। त०। ज्यो०। औ०। कल्प० परिभाएउ अव्य० (परिभाजयितुम् ) दायाऽऽदिषु विभज्य परिपेलव त्रि० (परिपेलव) अदृढे, निःसारे, वराके, आचा०१ श्रु०१ अ० | दातुमित्यर्थे , ''पकामं दाउं परिभाएउ / ' परिभाजयितुं दायाऽऽ
SR No.016147
Book TitleAbhidhan Rajendra Kosh Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijayrajendrasuri
PublisherRajendrasuri Shatabdi Shodh Samsthan
Publication Year2014
Total Pages1636
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size
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