SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 119
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आर्तध्यान में रत रुक्मिणी ने अपने दुर्भाग्य के लिए ऋषिदत्ता को दोषी माना। ऋषिदत्ता को मार्ग से हटाने के लिए वह उपाय सोचने लगी। परन्तु कोई भी सरल उपाय वह खोज न सकी। आखिर उसने सुलसा नामक योगिनी की सहायता ली। प्रचुर धन का प्रलोभन पाकर सुलसा योगिनी ने रुक्मिणी को विश्वस्त कर दिया कि शीघ्र ही वह ऋषिदत्ता को उसके मार्ग से हटा देगी। सुलसा योगिनी अपने विद्याबल से रथमर्दनपुर नगर में पहुंची। रात्रि में अपनी योगविद्या से उसने एक पुरुष का वध किया और उसके मांसपिण्ड ऋषिदत्ता की शैया पर डाल दिए। साथ ही रुधिर से ऋषिदत्ता का मुंह पोत दिया। परिणाम यह हुआ कि ऋषिदत्ता को नरभक्षिणी घोषित कर मृत्युदण्ड दे दिया गया। नगर से दूर आर्द्र लकड़ियों की चिता सजाकर ऋषिदत्ता को उस चिता में डालकर आग लगा दी गई। ___राजर्षि हरिषेण देह त्याग कर देव हुए थे। पुत्री की यह दुर्दशा देखकर वे वहां आए और उसकी रक्षा की। पुत्री को रूपपरावर्तिनी विद्या देकर और अपने खोए हुए पद व गौरव की पुनर्णाप्ति की युक्ति बताकर वे अपने स्थान पर लौट गए। राजकुमार कनकरथ ऋषिदत्ता को भूल नहीं पाया। उसे विश्वास नहीं था कि ऋषिदत्ता नरभक्षिणी हो सकती है। वह अहर्निश उसी की स्मृति में खोया रहता। रुक्मिणी ने अपना पथ प्रशस्त पाकर अपने पिता से कहकर रथमर्दनपुर दूत भिजवाया। राजा हेमरथ ने दूत का स्वागत किया और शीघ्र ही अपने पुत्र के विवाह के लिए आने का वचन दे दिया। कनकरथ पुनर्विवाह के लिए तैयार नहीं था, पर पिता के वचन की रक्षा के लिए उसे काबेरी के लिए प्रस्थान करना पड़ा। उधर ऋषिदत्ता एक ऋषि युवक का वेश धरकर कनकरथ के मार्ग पर बैठ गई। दोनों में परस्पर घनिष्ठता निर्मित हुई। कनकरथ ने युवक ऋषि को अपने साथ रहने के लिए मना लिया। बारात काबेरी पहुंची और कनकरथ के साथ रुक्मिणी का विवाह सम्पन्न हो गया। पति-पत्नी की प्रथम भेंट में दोनों के मध्य परस्पर वार्तालाप हुआ। ऋषिदत्ता के प्रसंग पर भावुक बनकर रुक्मिणी ने स्पष्ट किया कि उसने ही अपने प्रियतम को पाने के लिए ऋषिदत्ता को मार्ग से हटाया है। इससे कनकरथ चौंक गया। वस्तुस्थिति जानने के लिए उसने कृत्रिम प्रेम दिखाते हुए रुक्मिणी से पूछा कि उसने ऋषिदत्ता को मार्ग से हटाने के लिए क्या किया। इस पर रुक्मिणी ने विश्लेषणपूर्वक पूरी बात बता दी। ___कनकरथ का ऋषिदत्ता पर अनन्य अनुराग भाव था। रुक्मिणी के षड्यन्त्र के कारण उसे अपनी पत्नी को खोना पड़ा है, यह बात जानकर कनकरथ के क्रोध का पारावार न रहा। उसने तलवार खींच ली और कड़ककर बोला, दुष्टे! तू एक निरपराधिनी स्त्री की हत्यारी है! मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा! पास के कक्ष में विश्रामशील ऋषि युवक कनकरथ के वचन सुनकर सावधान हो गया। उसने तत्क्षण मध्यस्थता की और कनकरथ को शान्त किया, साथ ही उसे विश्वास दिलाया कि उसे उसकी पूर्व पत्नी ऋषिदत्ता भी प्राप्त हो जाएगी। पास के कक्ष में जाकर ऋषि युवक ने अपना वास्तविक रूप प्राप्त किया और पति के के पास पहंचकर उसके चरण स्पर्श किए। कनकरथ के हर्ष का पार न रहा। ऋषिदत्ता की प्रार्थना पर कनकरथ ने रुक्मिणी को क्षमा कर दिया। इस प्रकार ऋषिदत्ता ने अपकारी पर भी उपकार कर नारी की गौरव-गरिमा को बढ़ा दिया। -इसिदत्ता चरियं ... 78 ... .. जैन चरित्र कोश ...
SR No.016130
Book TitleJain Charitra Kosh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSubhadramuni, Amitmuni
PublisherUniversity Publication
Publication Year2006
Total Pages768
LanguageHindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy