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________________ जैन पारिभाषिक शब्दकोश क्षान्तिक्षम जो शक्ति होने पर भी अप्रिय वचन आदि प्रतिकूल स्थिति को सहन करता है। क्षान्त्या न त्वशक्त्या क्षमते - प्रत्यनीकाद्युदीरितदुर्वचनादिकं सहत इति क्षान्तिक्षमः । (उ२१.१३ शावृ प ४८५, ४८६) क्षान्ति धर्म (स्था १०.६ ) (द्र उत्तमक्षमा) क्षायिक भाव कर्म-क्षय से होने वाली जीव की अवस्था । 'कर्मणां सर्वथा प्रणाशः - क्षयः । तेन निर्वृत्तो भावः क्षायिकः । (जैसिदी २.४६ वृ) क्षायिक सम्यक्त्व दर्शन - सप्तक के क्षय से प्राप्त होने वाला सम्यक्त्व । अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्टयक्षयानन्तरं मिथ्यात्वमिश्रसम्यक्त्वपुञ्जलक्षणे त्रिविधेऽपि दर्शनमोहनीयकर्मणि सर्वथा क्षीणे क्षायिकं सम्यक्त्वं भवति । (प्रसावृ प २८१ ) क्षायोपशमिक भाव कर्म के क्षयोपशम से होने वाली आत्मा की अवस्था । ..... क्षयोपशमः । तज्जन्यो भावः क्षायोपशमिकः । (जैसिदी २.४७ वृ) क्षायोपशमिक सम्यक्त्व दर्शन - सप्तक के क्षयोपशम से प्राप्त होने वाला सम्यक्त्व । मिथ्यात्वस्य - मिथ्यात्वमोहनीयकर्मण उदीर्णस्य क्षयादनुदीर्णस्य चोपशमात्सम्यक्त्वरूपतापत्तिलक्षणाद्विष्कम्भितोदयस्वरूपाच्च क्षायोपशमिकं सम्यक्त्वं व्यपदिशन्ति । (प्रसावृप २८१ ) तं खिप्पं Jain Education International क्षिप्र अवग्रहमति व्यावहारिक अवग्रह का एक प्रकार । क्षयोपशम की पटुता के कारण विषय को शीघ्र ग्रहण करना, जैसे-- शब्द को शीघ्र ग्रहण करना । प्रकृष्ट श्रोत्रेन्द्रियावरण क्षयोपशमादिपरिणामित्वात् क्षिप्रं शब्दमवगृह्णाति । ( तवा १.१६.१६) ...' उच्चारितमेव ओगिरहे । ॥ (व्यभा ४१०६) क्षीणमोह जीवस्थान/गुणस्थान का बारहवां प्रकार। मोहकर्म के सर्वथा क्षीण होने से होने वाली जीव की आत्मविशुद्धि । क्षीणो- निःसत्ताकीभूतो मोहः । ( सम १४.५ वृ प २७) क्षीराश्रव लब्धि लब्धि का एक प्रकार । वक्ता के वचनों को दूध के समान मधुर एवं आनंदमयी बनाने वाली योगज विभूति । 'खीरासव' त्ति क्षीरवन्मधुरत्वेन श्रोतॄणां कर्णमनः सुखकरं वचनमाश्रवन्ति - क्षरन्ति ये ते क्षीराश्रवाः । ( औपवृ प ५३) ९९ क्षुद्रहिमवान् वर्षधर वह वर्षधर पर्वत, जो हैमवत वर्ष के दक्षिण में, भरतवर्ष के उत्तर में, पूर्वी लवणसमुद्र के पश्चिम में और पश्चिमी लवणसमुद्र के पूर्व में स्थित है। यह भरत और हैमवतइन दोनों के मध्य विभाजन रेखा का काम करता है। हेमवयस्स वासस्स दाहिणेणं, भरहस्स वासस्स उत्तरेणं, पुरत्थि - मलवणसमुद्दस्स पच्चत्थिमेणं, पच्चत्थिमलवणसमुदस्स पुरत्थिमेणं, एत्थ णं जंबुद्दीवे दीवे चुल्लहिमवंते णामं वास- हरपव्व पण्णत्ते । (जं ४.१) भरतस्य हैमवतस्य च विभक्ता हिमवान् । (तभा ३.११ ) क्षुद्रिका मोकप्रतिमा स्व-मूत्रपान के आधार पर की जाने वाली तपस्या का विशेष प्रयोग । इस प्रतिमा को स्वीकार करने वाला साधक यदि भोजन करके आरोहण करता है तो उसकी समाप्ति छः उपवास से होती है। यदि भोजन किए बिना आरोहण करता है तो उसकी समाप्ति सात उपवास से होती है । खुड्डियां मोयपडिमं पडिवन्नस्स अणगारस्स । भोच्चा आरुभइ चोदसमेणं पारेइ । अभोच्चा आरुभइ सोलसमेणं पारेइ ॥ (व्य ९.४०, ४१ ) (द्र महतीमोकप्रतिमा) क्षुधा परीषह परीष का एक प्रकार। भूख से उत्पन्न वेदना, जो मुनि द्वारा भावपूर्वक सहनीय है। दिगिंछापरिगए देहे तवस्सी भिक्खु थामवं । न छिंदे न छिंदावए न पए न पयावए । कालीपव्वंगसंकासे किसे धमणिसंतए । मायणे असणपाणस्स अदीणमणसो चरे ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016091
Book TitleJain Paribhashika Shabdakosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2009
Total Pages346
LanguageHindi
ClassificationDictionary, Dictionary, & agam_dictionary
File Size17 MB
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