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________________ प्रक्षीणमहानसिक ] स्वयमभुक्तं सत् तथाविधलब्धिविशेषादत्रुटितम्, तच्च तन्महानसं च भिक्षालब्धभोजन मक्षीण महानसम्; तदस्ति येषां ते तथा (अक्षीणमहानसाः) । (श्रपपा. अभय. वृ. १५, पृ. २८ ) । ६. प्रक्षीणं महानसं येषां ते अक्षीणमहानसाः, येषां भिक्षा नान्यैर्बहुभिरयुपभुज्यमाना निष्ठां याति, किन्तु तैरेव जिमितैः, ते क्षीणमहानसाः । (श्राव. मलय. वृ. नि. ७५, पृ. ८० ) । ७. यस्मिन्नमत्रे प्रक्षीणमहान सैर्मुनिभिभुक्तं तस्मिन्नमत्रे चक्रवर्तिपरिजन भोजनेऽपि तद्दिने अन्नं न क्षीयते ते मुनयः अक्षीणमहानसाः कथ्यन्ते । (त. वृ. श्रुति ३-३६) । लाभान्तराय कर्म के प्रकृष्ट क्षयोपशम युक्त जिस ऋद्धि के प्रभाव से उस ऋद्धि के धारक महर्षि के भोजन कर लेने पर भोजनशाला में शेष भोजन चक्रवर्ती के कटक ( समस्त सैन्य ) के द्वारा भी भोजन कर लेने पर क्षीण नहीं होता-उतना ही बना रहता है - वह प्रक्षीणमहानस ऋद्धि कही जाती है । क्षीरणमहानसिक - देखो क्षीणमहानस । १. अक्षीणमहानसियस्स भिक्खा न अन्नेण णिट्ठविज्जइ, तम्मिए जिमिए निट्ठाइ । (श्राव. चू. मलय. वृ. पू. ८० उ.) २. अक्खीणमहानसिया भिक्खं जेणाणियं मुणो ते । परिभुक्तं चिय खिज्जइ बहुएहिं वि ण उण अन्नेहि ॥ ( प्रव. सारो. टीका १५०४, पृ. ४२६ ) । क्षीणमहानसिक की भिक्षा - प्रक्षीणमहानस ऋद्धि के धारक महर्षि के द्वारा लायी गई भिक्षा - अन्य बहुतों के द्वारा भोजन कर लेने पर भी समाप्त नहीं होती, किन्तु उसी के भोजन करने पर ही समाप्त होती है। इस ऋद्धि के धारक साधु को प्रक्षीणमहानसिक कहा जाता है । श्रक्षीरगमहालय - - १. जीए चउधणुमाणे समचउरसालयम्मि णर- तिरिथा। मंति यसंखेज्जा सा अक्खीणमहालया रिद्धी ॥ ( ति. प. ४-१०६१) । २. अक्षीणमहालयलब्धिप्राप्ता यतयो यत्र वसन्ति देव मनुष्य तैर्यग्योना यदि सर्वेऽपि तत्र निवसेयुः परस्परमबाधमानाः सुखमासते । (त. वा. ३-३६; पू. २०४; चा. सा. पू. १०१ ) । ३. अक्षीणमहालयद्धप्राप्ताश्च यत्र परिमितभूप्रदेशेऽवतिष्ठन्ते तत्रासंख्याता श्रपि देवास्तिर्यञ्चो मनुष्याश्च सपरिवारा: परस्परं बाधारहितास्तीर्थकरपर्षदीव सुखमासते । Jain Education International [ प्रक्षोहिणी (योगशा. स्वो विवरण १ - ८ ) । ४. प्रक्षीणमहालयास्तु मुनयो यस्मिन् चतुः शयेऽपि मन्दिरे निवसन्ति तस्मिन् मन्दिरे सर्वे देवाः सर्वे मनुष्याः सर्वे तिर्यअचोऽपि यदि निवसन्ति तदा तेऽखिला अपि श्रन्योन्यं वाधारहितं सुखेन तिष्ठन्ति इति प्रक्षीणमहालयाः । (त. वृ. श्रु. ३ - ३६ ) । जिस ऋद्धि से संयुक्त मुनि के द्वारा अधिष्ठित चार हाथ मात्र भूमि में प्रगणित मनुष्य और तियंच सभी जीव- निर्बाध रूप से समा जाते हैं वह क्षीणमहालय ऋद्धि कही जाती है । अक्षीणावास - देखो अक्षीणमहालय । जम्हि चउहत्थावि गुहा अच्छिदे संते चक्कवट्टिखंधावारं पिसा गुहा अवगाहदि सो अक्खोणावासो णाम । ( धव. पु. ६, पृ. १०२ ) । जिस महर्षि के चार हाथ प्रमाण ही गुफा में अवस्थित रहने पर उस गुफा में चक्रवर्ती का समस्त स्कन्धावार ( छावनी) भी प्रवस्थित रह सकता है उसे प्रक्षीणावास - प्रक्षीणमहालय ऋद्धि का धारक - जानना चाहिए । ८, जैन - लक्षणावली अक्षेम - मारीदि- डमरादीणमभावो खेमं णाम; तव्विवदमक्खेमं । ( धव. पु. १३, पृ. ३३६ ) । मारि ( प्लेग ), ईति और डमर (राष्ट्र का भीतरी व बाहिरी उपद्रव) आदि के प्रभाव को क्षेम तथा उनके सद्भाव को प्रक्षेम कहा जाता है । प्रक्षौहिणी - १. भेश्रोऽथ पढम पन्ती सेणा सेणामुहं हवइ गुम्मं । ग्रह वाहिणी उपियणा चमू तहाअणिक्किणी अन्तो || एक्को हत्थी एक्को य रहवरो तिण्णि चेव वरतुरया । पञ्चेव य पाइक्का एसा पन्ति समुद्दिट्ठा || पंती तिउणा सेणा सेणा तिउणा मुहं हवइ एक्कं । सेणामुहाणि तिष्णि उ गुम्मं एत्तो समखायं ॥ गुम्माणि तिणि एक्का य वाहिणी सा वि तिगुणिया पियणा । पियणाउ तिष्णि य चमू तिणि चमूणिक्किणी भणिया ।। दस य प्रणिक्कि - णिनामाउ होइ अक्खोहिणी ग्रह क्खाया । संखा एक्क्क्स्स उ अङ्गस्स तो परिकहेमि । एयावीस सहस्सा सत्तरिसहियाणि अट्ठ य सयाणि । एसा रहाण संखा हत्थीण वि एत्तिया चेव । एक्कं च सयसहस्सं नव य सहस्सा सयाणि तिष्णेव | पन्नासा चैव तहा जोहाण वि एत्तिया संखा ॥ पञ्चुत्तरा य For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016021
Book TitleJain Lakshanavali Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages446
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size12 MB
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