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________________ संलुंच-संवाय संक्षिप्त प्राकृत-हिन्दी कोष ७९९ शरीर आदि का संगोपन । पेड़ । एक स्मृतिकार मुनि । देखो संवट्ट = संलुंच सक [सं + लुञ्च ] काटना। संवर्त । संलेहणा । स्त्री [संलेखना] शरीर, कषाय संवत्तण देर संलेहा . [संलेखा] आदि का संवत्तय वि [संवर्तक] अपवर्तन-कर्ता । पुं. शोषण, अनशन-व्रत से शरीर-त्याग का बलदेव । वडवानल । अनुष्ठान । °सुअ न [श्रुत] ग्रन्थ विशेष । संवत्तवत्त पुं [संवर्तोद्वर्त] उलट-पुलट । संलोअ पुं[संलोक] दर्शन, अवलोकन । दृष्टि- संवद्धण न संवर्धन] वृद्धि । वि. वृद्धि करनेपात। जगत् । प्रकाश । वि. दृष्टि-प्रचार- वाला। वाला। संवय सक [सं+वद्] बोलना, कहना। संलोक सक [सं+लोक्] देखना। प्रमाणित करना। संवइयर पुं[संव्यतिकर] व्यतिसंबन्ध, विप संवय वि [संवत] आवृत्त, आच्छादित । रीत प्रसंग। संवर सक [सं +] निरोध करना । कर्म को संवग्ग पुं [संवर्ग] गुणाकार । गुणित । रोकना । बन्द करना । ढकना । गोपन करना। संवच्छर पुं [संवत्सर] वर्ष । पडिलेहणग संवर पुं. नतन कर्मबन्ध का अटकाव । भारतन [प्रतिलेखनक] वर्षगांठ। वर्ष में होनेवाले अठारहवें जिनदेव । चौथे संवच्छरिय पुं [सांवत्सरिक] ज्योतिषी । वि. जिनदेव के पिता । एक जैन-मुनि । पशुसंवत्सर-संबन्धी। विशेष । दैत्य-विशेष । मत्स्य की एक जाति । संवच्छल देखो संवच्छर। संवरण न. निरोध । गोपन। संकोचन । संवट्ट सकसं + वर्तय] एक स्थान में रखना। प्रत्याख्यान, परित्याग । श्रावक के बारह व्रतों का अंगीकार । अनशन । विवाह । वि. संकुचित करना। रोकनेवाला। संवट्ट पुं [संवर्त] पीड़ा। भयभीत लोगों का संवरिअ वि [संवृत] आसेवित आराधित । समवाय । तृण को उखाड़ने वाला वायु । संकोचित । आच्छादित । अपवर्तन । घेरा । बहुत गाँवों के लोग एकत्रित संवलण न [संवलन] मिलन । हो कर रहें वह स्थान, दुर्ग आदि । देखो संवलिअ वि [संवलित] व्याप्त । युक्त, संवत्त। मिलित । मिश्रित । संवट्टइअ वि [संवर्तकित] तूफान में फंसा । संववहार पुं [संव्यवहार] व्यवहार । संवट्टग पुं [संवर्तक] वायु-विशेष । अपवर्तन । संवस अक [सं+ वस] साथ में रहना । वास संवट्टण न [संवर्तन] अनेक मार्ग मिलते हों करना । संभोग करना। वह स्थान । अपवर्तन । संवट्टय पुं[संवर्तक] । देखो संवट्टग। संवह सक [ सं + वह ] वहन करना । अक. संवट्टिअ वि [दे. संवर्तित] संवृत, संकोचित । सज्ज होना। संवट्टिअ वि [संवर्तित] पिंडीभूत, एकत्रित । | संवहणिय वि [संवाहनिक] देखो संवाहसंवर्त-युक्त । णिय। संवड्ढ अक [सं + वृध्] बढ़ना। संवहिअ वि [संव्यूढ] जो सज्ज हुआ हो । संवत्त पुं [संवर्त] प्रलय काल । वायु-विशेष । | संवाद । पुं. पूर्वज्ञान को सत्य साबित करनेमेघ । मेध का अधिपति-विशेष । बहेड़ा का ) संवाय ) वाला ज्ञान । सबूत । विवाद । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016020
Book TitlePrakrit Hindi kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherPrakrit Jain Vidya Vikas Fund Ahmedabad
Publication Year1987
Total Pages910
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size19 MB
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