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________________ बाहुअ-बिब्बोअ संक्षिप्त प्राकृत-हिन्दी कोष भगवान् आदिनाथ का पुत्र, तक्षशिला का | बिंदु पुन [बिन्दु] अल्प अंश । बिन्दी, शून्य, राजा । बाहुबलि के प्रपौत्र का पुत्र । "मूल | अनुस्वार । दोनों भ्र का मध्य भाग । रेखान. बगल । गणित का एक चिह्न । कला स्त्री. अनुस्वार, बाहुअ पुं [बाहुक] एक ऋषि । बिन्दी । °सार न. चौदहवां पूर्व, जैन ग्रन्थांशबाहुडिअ वि [दे] लज्जित । गत, चलित । विशेष । पुं. मौर्य वंश के राजा चन्द्र गुप्त का बाहुया स्त्री [बाहुका] त्रीन्द्रिय जन्तु-विशेष । बाहुलग देखो बाहु। बिंद्रावण न [वृन्दावन] वैष्णव-तीर्थ । बाहुलेय पुं [बाहुलेय] गो-वत्स, बैल । बिंब सक [बिम्ब ] प्रतिबिम्बित करना । बाहुलेर पुं [बाहुलेय] काली गाय का | बिब न [बिम्ब प्रतिमा । छन्दविशेष । न. बछड़ा। | कुन्दरुन का फल । प्रतिच्छाया । अर्थ-शून्य बाहुल्ल न [बाहुल्य] बहुलता, प्रचुरता । __ आकार । सूर्य तथा चन्द्र का मण्डल । बाहुल्ल वि [बाष्पवत्] अश्रुवाला। बिंबवय न [दे] फल-विशेष, भिलावाँ । बि वि. ब. [द्वि] दो। °जडि पुं [°जटिन्] | बिंबिसार देखो भिभिसार । एक महाग्रह, ज्योतिष्क देव-विशेष । °दल न. | बिबी स्त्री [बिम्बी] लता-विशेष, कुन्दरुन का चना आदि दो टुकड़े वाला धान्य । °याल | । गाछ । °फल न. कुन्दरुन का फल । देखो बा-याल । °यालसय पुंन [°चत्वा- | बिबोवणय न दे] क्षोभ । विकार । रिंशच्छत] एक सौ बेआलीस । °विह वि | ओसीसा । विध] दो प्रकार का। "सट्ठि स्त्री | बिह सक [बंह ] पोषण करना । [°षष्टि] बासठ । सत्तरि, °सयरि स्त्री | बिग्गाइआ । स्त्री [दे] कीट-विशेष, [°सप्तति] बहत्तर । बिग्गाई ) संलग्न रहता कीट-युग्म । बि° । वि [द्वितीय] दूसरा । 'कसाय पुं | बिज देखो बीज। बिअ , [°कषाय] अप्रत्याख्यानावरण बिजउर न [बीजपूर] एक तरह का नीबू । कषाय । बिजय (अप) देखो बिइज्ज । बिअ न [द्विक] दो का समुदाय, युग्म, युगल । बिट्ट पुं [दे] लड़का, पुत्र । बिआया स्त्री [दे] संलग्न कीट-द्वय । बिट्टी स्त्री [दे] पुत्री, लड़की । बिइअ देखो बिइज्ज । बिट्ठ वि [दे. विष्ट] बैठा हुआ, उपविष्ट । बिइआ देखो बीआ। बिडाल बिडाल] स्त्री [बिडालिका, बिइज्ज वि [द्वितीय] दूसरा। सहाय, मदद | बिडालिआ ली] बिल्ली । करनेवाला। बिडाली , बिउण वि [द्विगुण] दुगुना । °ारय वि | बिडिस देखो बडिस । [°कारक] दुगुना करनेवाला । बिदिय देखो बिइअ। बिउण सक [द्विगुणय] दुगुना करना । बिन्ना स्त्री [बेन्ना] भारत की एक नदी । बिंट न [वृन्त] फलादि का बन्धन । °सुरा | बिब्बोअ ' [विव्वोक स्त्री की शृंगार-चेष्टास्त्री. दारू । विशेष, इष्ट अर्थ की प्राप्ति होने पर गर्व से बिंदिय वि [द्वीन्द्रिय] जिसको त्वचा और जीभ | उत्पन्न अनादर-क्रिया । लीला । काम-विकार । ये दो ही इन्द्रियाँ हों वह । न. उपधान, तकिया। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016020
Book TitlePrakrit Hindi kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherPrakrit Jain Vidya Vikas Fund Ahmedabad
Publication Year1987
Total Pages910
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size19 MB
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