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________________ कुदेव कुयुधर तथा तार्किक थे । आ० विद्यानन्द ने अपने ग्रन्थों में इनकी कारिकायें उद्धत की हैं। समय-अकलंक तथा विद्यानन्दि के मध्य ई. श ८-६ का मध्य । (ती/२/३५०,४४८)।६. पंचस्तूप संघ की गुर्वावली के अनुसार द्वि० कुमारसेन विनयसेन के शिष्य थे। नाथूराम जी प्रेमी के अनुसार ये काष्ठा संघ के संस्थापक थे। समयवि०८४५-19 ई०७८८-८९) । परन्तु सि० वि/प्र० ३८/५० महेन्द्र कुमार के अनुसार ई० ७२०-८००। ७. नन्दिसंघदेशीयगण के अनुसार आविद्धकरण पद्यनन्दि न०२ का नाम कोमार देव था। समय ई०६३०-१०३०/दे. इतिहास/७/५ । ८ कुमार पण्डित जिनका समय ई० १२३६ है (का० अ०/प्र०७१/ A.N.up ) | कूदेव-१. कुदेवको विनयका निषेध-दे० विनय/४ । २. कुदेवकी विनयादिके निषेधका कारण-दे० अमूढदृष्टि/३ । कूधर्म-१, कुधर्मकी विनयका निषेध-दे० विनय/४ । २ कुधर्म के निषेधका कारण-दे० अमूढदृष्टि/३। कुपात्र-दे० पात्र । कूप्य-स, सि./७/२६/३६८/8 कुप्यं क्षौमकापसिकौशेयचन्दनादि । रेशम, कपास और कोसाके वस्त्र तथा चन्दन आदि कुप्य कहलाता है। (रा. वा /७/२६/१/५५५/१०) । कुबेर-१, अरहनाथ भगवान्का शासक यक्ष-दे०तीर्थं कर/५/३ । २. दे. लोकपालदेव । कुथुमि-एक अज्ञानवादी-दे० अज्ञानवाद । कुब्जक संस्थान-दे० संस्थान। कुब्जा -भरतक्षेत्र आर्य खण्डकी एक नदी-दे० मनुष्य/४ । कुभोगभूमि-दे० भूमि। कुमति-दे० मतिज्ञान । कुमानुष-दे० म्लेक्ष/अन्तपिज । कुमार-१. श्रेयांसनाथ भगवान्का शासक यक्ष-दे० तीर्थंकर/५/३ । २. आत्म- प्रबोध/प्र. पं० गजाधरलाल-आप कविवर थे। द्विजवंशावतस विद्वदर गोविन्दभट्टके ज्येष्ठ पुत्र थे व प्रसिद्ध कवि हस्तिमालके ज्येष्ठ भ्राता थे। समय-ई० १२६० वि० १३४७ । कृति-आत्मप्रबोध। कुमार-इस नामके अनेकों आचार्य, पंडित व कवि आदि हुए है जैसे कि -१. नागर शाखाके आचार्य कुमारनन्दि जिन्होंने मथुरा के सरस्वती आन्दोलन मे ग्रन्थ निर्माण का कार्य किया था। नागर शाखा ई श. १ में विद्यमान थी। (जै./२/१३५) २.द्वि. कुमारनन्दिका नाम कुन्दन्कुद के शिक्षागुरु के रूप में याद किया जाता है । लोहाचाप तथा माघनाद के समकालीन अनुमान किये जाते हैं । (पं का/ता-वृ./मंगलाचरण/१): (का० अ०/प्र. ७०/A.N.up)। माघनम्दि के अनुसार आप का काल बी नि ५७५-६१४ (ई.४८८७)। दे०--इतिहास/७/४।-नन्दिसध बलात्कारगण के अनुसार विक्रम शक स० ३६-४० ( ई० ११४-११८ । । श्रुतावतारके अनुसार वि०नि०५६३-६१४ (ई. ६६-८७) नन्दिसंघ बलात्कारगणकी गुर्वावलीके अनुसार (दे० इतिहास) आप वजनन्दिके शिष्य तथा लोकचन्द्रके गुरु थे -विक्रम शक सं०३८६-४२७ (ई० ४६४-५०५) । समय -- ४१ वर्ष आता है। ३. कार्तिकेयानु प्रेक्षा के कर्ता कुमार स्वामी उमा स्वामी के समकालीन या उनके कुछ उत्तरवर्ती हैं। का० अ०/३६४ की टीका में जो ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि "स्वामी कार्तिकेयमुनि' क्रौञ्चराजकृतोपसर्गसो ढ्वासाम्यपरिणामेण देवलोके प्राप्त।" यह सम्भवतः किसी दूसरे व्यक्ति के लिये लिखा गया प्रतीत होता है। भ० अ०/१५४६ में क्रौच पक्षी कृत उपसर्ग को प्राप्त एक व्यक्ति का उल्लेख मिलता है । उमास्वामी के अनुसार कुमार स्वामी का समय वि० श०२-३ (ई० श०२ का मध्य) आता है। (जै०/२/१३४, १३८) । ४. कुमार सेन गुरु चन्द्रोदय के कर्ता आ०, प्रभाचन्द के गुरु थे। आपने मूलकुण्ड नामक स्थान पर समाधिमरण किया था। वि०७५३ में आपने काष्ठा संघ की स्थापना की थी। तदनुसार इनका समय वि० श०८ (ई. श०८ पूर्व) कतिपत किया जा सकता है । (ती/२/३५१); (इतिहास/७/88) कुमार नन्दि आचार्य बादन्याय''ग्रन्थ के रचयिता एक महान् जैन नैयायिक कुमारगुप्त-मगध देशकी राज्य वंशावली के अनुसार (दे० इतिहास) यह गुप्तवशका पाँचवाँ राजा था। "जैनहितैषी भाग १३ अंक १२ में प्रकाशित "गुप्त राजाओका काल, मिहिरकुल व कल्की" नामके लेख में श्री के० बी० पाठक बताते हैं कि यह राजा वि०४६३ ( ई० ४३६ ) मे राज्य करता था। और उस समय गुप्त संवत् ११७ था। समय--ई० ४३५-४६० विशेष--दे० इतिहास/३/४ । कुमारिल (भट्ट)-१. मीमांसक मतके आचार्य थे। सि वि /२५ ५० महेन्द्र के अनुसार-आपका समय--ई० श० ७ का पूर्वार्ध । (विशेष दे० मीमांसा दर्शन) । २ वर्तमान भारतका इतिहास--हिन्दू धर्मका प्रभावशाली प्रचारक था। समय---ई० श०८। कुमुद-१. विजयाध की उत्तर श्रेणीका एक नगर - दे० विद्याधर, २. देव कुरु का दिग्गजेन्द्र पर्वत- दे० लोक/५/३ । एक कूट व उसका रक्षक -दे०ल क । ७। ३. रुचक पर्वतस्थ एक कूट-दे० लोक ५/१३ ४. कालका एक प्रमाण विशेष--दे० गणित/I/१/४। कुमुदप्रभा-सुमेरु पर्वतके नन्दनादि वनो में स्थित एक वापी--दे० लोक/५/६। कुमुदवती-पा. पु/८/१०८-१११ देवकराजकी पुत्री पाण्डुके भाई विदुरसे विवाही गयी। कुमुदौल-भद्रशाल बनमे स्थित एक दिग्गजेन्द्र पर्वत--दे० लोक/७। कुमुदांग-कालका परिमाण विशेष--दे० गणित। [१/४ । कुमुदा-सुमेरु पर्वतके नन्दनादि वनों में स्थित एक वापी--दे० लक/५/६ कुरलकाव्य-आ० एलाचार्य अपरनाम कुन्दकुन्द (ई. शताब्दि २) कृत अध्यात्म नीति विषयक तामिल भाषामे रचित एक ग्रन्थ है दक्षिण देशमें यह तामिलवेदके नामसे प्रसिद्ध है, और इसकी जैनेतर लोगो में बहुत मान्यता है। इसमें १०,१० श्लोक प्रमाण १०८ परि च्छेद है। कुरु-१ भरत क्षेत्र आर्य खण्डका एक दश--दे० मनुष्/४ । २. 'म पु/प्र/४८६. पन्नालाल-सरस्वती नदीके बॉयी और का कुरजांगल देश । हस्तिनापुर इसकी राजधानी है । ३. देव व उत्तर फुर-(दे० लोक/३/११) कुरुवंश-१ पुराणको अपेक्षा कुरवंश-दे० इतिहास /१०/५। २. इतिहासकी अपेक्षा कुरुवंश--दे० इतिहास/३।२। कुयंधर-पा पु /२५/श्लोक -दुर्योधनका भानजा था (५६-५७) इसने पांचो पाण्डवों को ध्यानमग्न देख अपने मामाकी मृत्युका बदला लेनेके लिए उनको तपे लोहेके जेवर पहनाये थे (६२-६५) । जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश भा०२-१७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016009
Book TitleJainendra Siddhanta kosha Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2002
Total Pages648
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size24 MB
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