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________________ १९५ शुभकामना एवं श्रद्धार्चन श्रमण संघ की थाती हैं.... D जिनेन्द्र मनि 'काव्यतीर्थ' मालव रत्न पूज्य प्रवर हैं, ऊँचे मानव रत्न महान् । किये प्रयत्न आपने ऐसे, जिससे हो जग का कल्याण ॥ जग कल्याण किया करते जो, वे पाते पूजा का स्थान । पूजा स्थान प्राप्त कर लेना, लिए सभी के कब आसान ॥ जग सम्पूर्ण प्रकाशित होता, उदित सूर्य के हाथों से। विश्व सकल लाभान्वित होता, मुदित सन्त की बातों से ॥ परहित जीवन जीने वाले, परहित सब कुछ सहते सन्त । स्वहित तिरोहित कर परहित में, . सहिष्णुता का लेते पंथ ॥ जन-जन से सम्पर्क साधकर, जग को सुखी बनाते सन्त । उनका वही भवान्त जगत के, कष्टों का कर पाते अन्त ॥ ऐसे ज्ञानी मुनि का स्वागत, करते हैं हम सब मिलकर । ऋतुराज का स्वागत करते, ज्यों सारे सुमनस खिलकर ।। श्रावक और श्राविकायें ये, साधु-साध्वियां गाती हैं। श्री कस्तूरचन्दजी मुनिवर, श्रमण संघ की थाती हैं। वयोवृद्ध समृद्ध ज्ञान से, वचन सिद्ध मुनिवर प्यारे । श्रद्धा पुष्प 'जिनेन्द्र' चढ़ाता, परम प्रेम से स्वीकारे । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012006
Book TitleMunidwaya Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshmuni, Shreechand Surana
PublisherRamesh Jain Sahitya Prakashan Mandir Javra MP
Publication Year1977
Total Pages454
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size10 MB
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