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**Trivarnika Achar** After the Vagdan (engagement) and before the Varna Vidhi (wedding ceremony), there is a Pradan Vidhi (giving ceremony) for the bride, performed by the groom's father. He worships the Kalash (pot) and the Acharya (priest), adorns the bride with clothes, ornaments, etc., giving her fine silk clothes, earrings, necklaces, and ornaments for her hands, feet, head, etc. Then, he accepts the blessings given by the Brahmanas (priests) and gives them fruits, etc. **Meaning:** After the engagement, the giving of ornaments to the bride by the groom's father is called the Pradhan Vidhi. || 49-50 || **Atha Varanam - Varna Vidhi** The groom, worshipped by the Madhuparka (a sweet drink), who is virtuous, righteous, and full of good qualities, should give Dakshina (gifts) to the Brahmanas and request them, "Madartham Vrini Dhvam Kanyam," meaning, "For my sake, all of you accept this bride." Then, the bride's father, standing near the bride, should perform the Gotrocharan (declaration of lineage) with the Brahmanas, saying, "I, born in the [insert groom's lineage], the great-grandson of [insert name], the grandson of [insert name], the son of [insert name], give this bride, [insert bride's name], the great-granddaughter of [insert name], the granddaughter of [insert name], the daughter of [insert name], to [insert groom's name]. O Brahmanas, accept her." In response, all the Brahmanas should say, "We all accept this bride." Then, all the virtuous people should recite auspicious verses like "Suprayukta." || 51-55 || **Panipidan - Pani-Pidan Vidhi** The bride, chosen by you, who is righteous, prosperous, and fulfilling all three Purusharthas (goals of life), takes your hand with her own hands. This is called the Panipidan Vidhi. **Meaning:** The joining of the hands of the groom and bride is called Panipidan. || 56 || **Note:** In place of the word "Amuka," the names of the groom and bride's great-grandparents, etc., should be inserted.
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________________ Wwri--- त्रैवर्णिकाचार। वाग्दानके बाद और विवाह समय होनेवाली वरणविधिसे पहले कन्याकी प्रदानविधि होती है, जो वरके पिताकी ओरसे की जाती है । कलश और आचार्यकी पूजा कर कन्याको वस्त्र-अलकार आदिसे विभूषित करे, उसे उत्तम कीमती रेशमी कपड़े, कानों में पहननेके दांगीने, कंठमें पहननेके दागीने, हाथ पैर शिर आदि स्थानोंमें पहनने योग्य दागीने देवे । अनन्तर ब्राह्मणों के द्वारा दिये हुए आशीर्वादको ग्रहण कर उन्हें (ब्राह्मणोंको ) फल वगैरह देवे । भावार्थ-सगाईके बाद लड़कीके लिए वरके पिताकी ओरसे गहना देनेको प्रदान-विधि कहते हैं ।। ४९-५० ॥ अथ वरणं-वरणविधि। मार्थयेद्गुणसम्पूर्णान् मधुपर्केण पूजितः । मदर्थं वृणीध्वं कन्यामिति दत्वा च दक्षिणाम् ।। ५१ ॥ गोत्रोद्भवस्य गोत्रस्य सम्बन्धस्यामुकस्य च । नप्ने पौत्राय पुत्राय ह्यमुकाय वराय चै ॥ ५२ ॥ कन्याया अपि मोत्रस्य यथापूर्ववदुच्चरेत् । नप्त्रीमथ च पौत्री च पुत्री कन्यां यथाविधि।। ५३ ॥ कन्यासमीपमागत्य ब्राह्मणैः सह वै पिता। इत्युक्त्वा भो द्विजा यूयं वृणीध्वं कन्यकामिमाम् ॥ ५४ ॥ प्रत्यूचुः सज्जनाः सव वयं चैनां वृणीमहे । सुप्रयुक्तति सूक्तं वै जपेयुः सज्जनास्ततः ।। ५५ ॥ .मधुपर्कद्वारा पूजा किया गया वर, व्रती सदाचारी गुणवान् ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा देकर, "मदर्थ कन्यां वृणीध्वं" अर्थात् " मेरे लिए आप सब लोग मिलकर कन्या स्वीकार करो" ऐसी मार्थना करे । बाद कन्याका पिता कन्याके समीप आकर ब्राह्मणोंके साथ इस प्रकार गोत्रोचारण करे कि म, अमुक गोत्रमें उत्पन्न हुए अमुकका प्रपोता, अमुकका पोता, अमुकका पुत्र, . अमुक नामवाले वरके लिए अगुककी प्रपोती, अमुककी पोती, अमुककी लड़की, अमुक नामवाली कन्याको देता हूं। हे ब्राह्मणो! आप लोग स्वीकार करो । इसके बदलेमें वे सब ब्राह्मण लोग कहें कि हम सब इस कन्याको स्वीकार करते हैं। बाद सारे सजन “सुप्रयुक्ता" इत्यादि सुभाषितोंको पढ़ें ॥ ५१-५५!! ' पाणिपीडन-पाणि-पीड़न-विधि। . धर्मे चार्थे च कामे च युक्तेति चरिता त्वया । इयं गृह्णाति पाणिभ्यां पाणीति पाणिपीडनम् ॥ ५६ ॥ 'धर्म, अर्थ और काम, इन तीन पुरुषार्थोसे युक्त तेरेद्वारा वरण की हुई यह कन्या तेरे हाथोंको अपने हाथोंसे पकड़ती है। इस तरह पाणिपीडन-विधि होती है ।. भावार्थ-वर-कन्याका ह्यलेवा . जोड़ने (परस्पर हाथ मिलाने ) को पाणिपीडन कहते हैं ॥ ५६ ॥ । १ इन अमुक शब्दोंकी जगह वर-कन्या के प्रपितामह आदिका नाम जोड़ लेना चाहिए।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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