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________________ षटखंडागम, कम्मपयडी, सतक और सित्तरी प्रकरण . [क्या इनका एक ही उद्गम है ? ] ५० हीरालाल जैन जिम प्रकार पट्खडागम दिगम्बर सम्प्रदाय का आद्य परम मान्य सिद्धान्त ग्रन्थ माना जाता है, उसी प्रकार कम्मपयडी, सतक और मित्तरी प्रकरण नाम से प्रसिद्ध ग्रन्थ भी श्वेताम्बर सम्प्रदाय मे प्रामाणिक एव प्राचीन शास्त्र माने जाते हैं। पर्वमाधारण पट्खडागम को दिगम्बर अन्य और कम्मपयडी, मतक और मित्तरी को श्वेताम्बर ग्रन्थ ममझते है, परन्तु जब उक्त चारो ग्रन्यो की उत्यानिकानो को देखते है तो एक नये ही रहम्य का उद्घाटन होता है । इसलिए उक्त चारो ग्रन्यो को उत्थानिकानो पर पाठको को दृष्टिपात करना आवश्यक है। पट्खडागम की प्रसिद्ध धवला टोका मे उसकी उत्पत्ति का जो उद्गम वनलाया गया है वह इस प्रकार है एत्य किमायारादो, एव पुच्चा मवेसि । णो आयारादो, एव वारणा मवेमि । दिट्टिवादादो । (पट्ख० भाग १, पृ०१०८) तस्म पच अत्याहिमारा वति, परियम्म-मुत्त-पढमाणियोग-पुब्बवगय चूलिया चेदि। (पट्ख० भा० १, पृ० १०६) एत्य किं परियम्मादो, किं सुत्तादो? एव पुच्छा मन्बेमि । णो पग्यिम्मादो, णो सुत्तादो, एव वारणा मवेसि । पुन्वगयादो। (नम्स) अत्याहियारो चोद्दमविहो। त जहा-उत्पादपूर्वxxxइत्यादि । (पटन० भा० १, पृ० ११४) एत्य किमुप्पाय पुव्वादो, किमग्गेणियादो? एव पुच्या सर्वसि । णो उप्पायपुव्वादो, एव वारणा सर्वोमि । अग्गेणियादो। xxx(तम्स) अत्याधियारो चोहमविहो । त जहा-पुन्वते, अवरते, धुवे, अवे, चयणलद्वीxxx इत्यादि । एत्य किं पुव्वत्नादो, किं अवरनादो ? एव पुच्चा सन्वेसि कायबा। णो पुव्वत्तादो, णो अवरत्तादो, एव वारणा मसिं कायन्वा । चयणलद्धीदो। (पटव० भा० १, पृ० १०३)xxx(तस्म) अत्याधियारो वीमदिवियो। एत्य किं पढमपाहुडादो, किं विदियपाहुडादो? एव पुच्छा मवेसि णेयव्वा । णो पढमपाहुडादो, णो विदियापाहुडादो, एव वारणा मन्त्रेमि णेयन्वा । चउत्थपाहुडादोxxx कम्मपयडिपाहुडादो। (पट्ख० भा० १, पृ० १२०)yxxतम्म अत्याहियारो चउवीमादिविहो। त जहाकदी, वेदणाए, फासे, कम्मे,पयडीसुविधणे, णिवघणे, पक्कमे, उवक्कमे, उदये, मोक्खे, सकमे, लेस्सा, लेस्सायम्मे, लेस्सा परिगामे, सादमसादे, दोहे, रहस्से, भवधारणीये, पोग्गलत्ता, णिवत्तमणिवत्तं, णिकाचिदमणिकाचिद, कम्मटिदी, पच्छिमक्खघेत्ति । अप्पावहुग च सव्वत्य ।xxxएत्य किं कदीदो, किं वेयणादो, एव पुच्छा सव्वत्य कायव्वा । णो कदीदो, णो वेयणादो, एव वारणा मन्त्रेमि णेयवा। ववणादो Ixxxतम्स अत्याधियारो चउबिही। त . जहा बघो, ववगो, वणिज्जो, वधविधाण चेदि । एत्य किं ववादो, एव पुच्छा सव्वेसि कायव्वा । णो बवादो णो वणिज्जादो। ववगादो, बधविधाणादो च।xxxवविधाण चउविह । त जहा-पयडिववो, ट्ठिदिवयो, अणुभागवधो, पदेमववो चेदि । तत्य जो यो पयडिववो मो डुविहो, मूलपयडिवयो, उत्तरपयडिबधी चेदि । XXXइत्यादि (पट्ख० भा० १, पृ० १२५-१२६) गतकप्रकरण की उत्यानिका मे चूर्णिकार ने उमकी उत्पत्ति का जो क्रम बतलाया है, वह उपर्युक्त शब्दो में ही इस प्रकार है xxxदिट्टिवायादो कहेमि । किं परिकम्म-मुत्त-पढमाणुप्रोग-पुब्बगय-चूलिगामइयातो मन्वानो दिट्टिवायायो कहेनि ? न इत्युच्यते पुवगयाओ। किं उप्पायपुव अग्गेणिय जाव लोगविंदुसारापो त्ति एयाओ चोद्दसविहानो सब्वानो पुत्रगयाो कहेसि ? न इत्युच्यते, अग्गेणियातो वीयानो पुवातो। किं अट्ठवत्युपरिणामानो
SR No.010849
Book TitlePremi Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPremi Abhinandan Granth Samiti
PublisherPremi Abhinandan Granth Samiti
Publication Year
Total Pages808
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth
File Size34 MB
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