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________________ २२६ to go abso कककक ब्रह्मविलास में पीतो सुधा स्वभावकी, जी ! तो कहूं सुनाय ॥ तू रीतो क्यों जातु है, वीतो नरभव जाय ॥ १२ ॥ मिथ्यादृष्टि निकृष्ट अति, लखै न इष्ट, अनिष्ट ॥ भ्रष्ट करत है सिष्टको शुद्ध दृष्टि दै पिष्ट ॥ १३ ॥ चेतन कर्म उपाधि तज, राग द्वेपको संग ॥ ज्यों प्रगटै परमातमा, शिव सुख होय अभंग ॥ १४ ॥ ब्रह्म कहूं तो मै नहीं, क्षत्री ह पुनि नाहिं ॥ वैश्य शुद्र दोऊ नहीं, चिदानंद हूं माहिं ॥ १५ ॥ जो देखै इहि नैनसों, सो सव विनस्यो जाय || तासों जो अपनो कहै, सो मूरख शिरराय ॥ १६ ॥ पुद्गलको जो रूप है, उपजै विनस सोय ॥ an opan se जो अविनाशी आतमा, सो कछु और न होय ॥ १७ ॥ देख अवस्था गर्भकी, कौन कौन दुख होंहि ॥ बहुर मगन संसारमें, सौ लानत है तोहि ॥ १८ ॥ अधो शीस ऊरध चरन, कौन अशुचि आहार ॥ थोरे दिनकी बात यह, भूलि जात संसार ॥ १९ ॥ अस्थि धर्म मलमूत्रमें रैन दिनाको वास ॥ देखें दृष्टि घिनावनो, रोगादिक पीड़ित रहै, तऊ न होय उदास ॥ २० ॥ महाकष्ट जो होय ॥ .. तबहू मूरख जीव यह, मरन समय विललात हैं, धर्म न चिन्तै कोय ॥ २१ ॥ कोऊ लेहु वचाय ॥ जानै ज्यों त्यों जीजिये, जोर न कछू बसाय ॥ २२ ॥ फिर नरभव मिलिवो नहीं, किये हु कोट उपाय ॥ 'तातें बेगहि चेत हू, अहो जगतके. राय ॥ २३ ॥ 4 pede as geds de dade de d 4 fost do defde Gods diy cheio de de de die thin afarizard defy and die/dspa
SR No.010848
Book TitleBramhavilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year
Total Pages312
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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