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________________ ple • प्रवचनसारः W ३७३ कधर्मित्वाद्यथोदितैकान्तात्मात्मद्रव्यम् । युगपदनन्तधर्मव्यापकानन्तनयव्याप्येकश्रुतज्ञानलक्षणप्रमाणेन निरूप्यमाणं तु समस्ततरङ्गिणीपयः पूरसमवायात्मकैकमकराकरवदनन्तधर्माणं वस्तुत्वेनाशक्यविवेचनत्वान्मेचकखभावानन्तधर्मव्याप्येकधर्मित्वात् यथोदितानेकान्तात्मात्मद्रव्यं स्यात्कार श्रीवासवश्यैर्नयौघैः पश्यन्तीत्थं चेत् प्रमाणेन चापि पश्यन्त्येव, प्रस्फुटानन्तधर्मस्वात्मद्रव्यं शुद्धचिन्मात्रमन्तः । इत्यभिहितमात्मद्रव्यमिदानीमेतदवाप्तिप्रका - रोऽभिधीयते - अस्य तावदात्मनो नित्यमेवानादिपौद्गलिककर्मनिमित्तमोह भावनानुभावघूर्णितात्मवृत्तितया तोयाकरस्येवात्मन्येव क्षुभ्यतः क्रमप्रवृत्ताभिरनन्ताभिर्ज्ञाप्तिव्यक्तिभिः परिवर्तमानस्य ज्ञप्तिनिमित्ततया ज्ञेयभूतासु बहिरर्थव्यक्तिषु प्रवृत्तमैत्रीकस्य शिथिलतात्मविवेकतयात्यन्त बहिर्मुखस्य पुनः पौगलिककर्मनिर्मापकरागद्वेषद्वैतमनुवर्तमानस्य दूरत एवात्मावाप्तिः । अथ यदा त्वयमेव प्रचण्डकर्मकाण्डोच्चण्डीकृताखण्डज्ञानकाण्डत्वेनानादिपौगलिककर्मनिर्मितस्य बध्यघातकविभागज्ञानपूर्वकविभागकरणात् केवलात्मभावानुभावनिश्चलीकृतवृत्तितया ष्यवबुद्धिसद्धर्मश्रवणग्रहणधारणश्रद्धानसंयमविषयसुखनिवर्तनक्रोधादिकषायव्यावर्तनादिपरंपरादुमान्यपि कथंचित्काकतालीयन्यायेनावाप्य सकलविमल केवलज्ञानदर्शन खभावनिजपरमात्मतत्त्वसम्यक् श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिसंजातरागाद्युपाधिरहितपरमानन्दैकक्रमसे प्रवृत्त हुए अनन्त इन्द्रिय-ज्ञानके भेदोंसे सदाकाल पलटता रहता है, एकरूप नहीं, अज्ञानभावकर परस्वरूप बाह्यपदार्थो में आत्मबुद्धिसे मैत्रीभाव करता है, आत्मविवेककी शिथिलता से सर्वथा बहिर्मुख हुआ है, बारम्बार पुगली ककर्मके उपजानेवाले राग द्वेष भावों की द्वैततामें प्रवर्त रहा है । ऐसे आत्माको शुद्ध चिदानन्द परमात्मा की प्राप्ति कहाँ से हो सकती है ? यदि यही आत्मा अखंड ज्ञानके अभ्याससे अनादि पुद्गलीककर्म से उत्पन्न हुआ जो मिथ्यामोह उसको अपना घातक जानकर भेदाभिज्ञान द्वारा अपनेसे जुदा करके केवल आत्मस्वरूपकी भावनासे निश्चल (थिर) होवे, तो अपने स्वरूपमें निस्तरंग समुद्र की तरह निष्कंप हुआ तिष्ठता है । एक ही बार व्याप्त हुए जो अनन्तज्ञानकी शक्ति के भेद उनकर यह पलटता नहीं है । अपनी ज्ञान शक्तियोंकर बाह्य पररूप ज्ञेय पदार्थों में मैत्रीभाव नहीं करता है | निश्चल आत्मज्ञानकी विवेकतासे अत्यन्त स्वरूपके सन्मुख हुआ है। पुद्गलकर्मबंधके कारण राग द्वेषकी द्विविधासे दूर रहता है । ऐसा जो परमात्माका आराधक पुरुष है, वही पूर्व में नहीं अनुभव किये हुए और ज्ञानानन्द स्वभाव ऐसे परब्रह्मको पाता है । आप ही साधक है, आप ही साध्य है, अवस्थाके भेदसे साध्य-साधक भेद हैं । यह सम्पूर्ण जगत् भी ज्ञानानन्दखरूप परमात्मभावको प्राप्त होवे, और आनंदरूप अमृत-जल के प्रवाह - कर पूर्ण बहती हुई इस केवलज्ञानरूपी नदीमें जो आत्मतत्त्व मग्न होरहा है, जो समस्त ही लोकालोकके देखनेको समर्थ है, ज्ञानकर प्रधान है, जो तत्त्व अमूल्य उत्तम महारत्नकी तरह अतिशोभायमान है उस आत्मतत्त्वको स्याद्वादरूपी जिनेश्वरके मतको स्वीकार करके हे जगत् के भव्यजीवो ! तुम अंगीकार करो, जिससे कि परमानंदसुखको प्राप्त होवो | इस प्रकार कुंदकुंदाचार्यकृत प्रवचनसार में यह चरणानुयोग पूर्ण हुआ । f
SR No.010843
Book TitlePravachansara
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorA N Upadhye
PublisherManilal Revashankar Zaveri Sheth
Publication Year1935
Total Pages595
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size48 MB
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