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________________ १७ वौ वर्ष ५७ सभी उपदेशो तथा हावभावोसे वे लेशमात्र न पिघले। ऐसी महाविशाल दृढतासे रुक्मिणीने बोध प्राप्त करके निश्चय किया कि ये समर्थ जितेंद्रिय महात्मा कभी चलित होनेवाले नहीं है। लोहे और पत्थरको पिघलाना सरल है, परन्तु इन महापवित्र साधु वज्रस्वामीको पिघलानेकी आशा निरर्थक होते हुए भी अधोगतिका कारणरूप है । इस प्रकार सुविचार करके उस रुक्मिणीने पिताकी दी हुई लक्ष्मीको शुभ क्षेत्रमे लगाकर चारित्र ग्रहण किया, मन, वचन और कायाका अनेक प्रकारसे दमन करके आत्मार्थ साधा। इसे तत्त्वज्ञानी सवरभावना कहते हैं । इति अष्टम चित्रमें सवरभावना समाप्त हुई। नवम चित्र निर्जरा भावना द्वादश प्रकारके तपसे कर्म-समूहको जलाकर भस्मीभूत कर डालनेका नाम निर्जराभावना है । तपके बारह प्रकारमे छ बाह्य और छः अभ्यत र प्रकार है । अनशन, ऊनोदरी, वृत्तिसक्षेप, रस-परित्याग, कायक्लेश और संलीनता ये छ बाह्य तप है । प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, शास्त्र-पठन, ध्यान और कायोत्सर्ग ये छ. अभ्यंतर तप है । निर्जरा दो प्रकारकी है-एक अकाम निर्जरा और दूसरी सकाम निर्जरा । निर्जराभावनापर एक विप्र-पुत्रका दृष्टात कहते है। दृष्टांत-किसी ब्राह्मणने अपने पुत्रको सप्तव्यसनभक्त जानकर अपने घरसे निकाल दिया। वह वहाँसे निकल पडा और जाकर उसने तस्करमडलोसे स्नेहसबंध जोडा । उस मडलीके अग्रेसरने उसे अपने काममे पराक्रमी जानकर पुत्र बनाकर रखा। वह विप्रपुत्र दुष्टदमन करनेमे दृढप्रहारी प्रतीत हुआ । इससे उसका उपनाम दृढप्रहारी रखा गया । वह दृढप्रहारी तस्करोमे अग्रेसर हुआ। नगर, ग्रामका नाश करनेमे वह प्रबल हिंमतवाला सिद्ध हुआ। उसने बहुतसे प्राणियोके प्राण लिये । एक बार अपने सगति समुदायको लेकर उसने एक महानगरको लूटा । दृढप्रहारी एक विपके घर बैठा था । उस विप्रके यहाँ बहुत प्रेमभावसे क्षीरभोजन बना था। उस क्षीरभोजनके भाजनको उस विप्रके मनोरथी बाल-बच्चे घेरे बैठे थे। दृढप्रहारी उस भाजनको छूने लगा, तब ब्राह्मणीने कहा, "हे मूर्खराज | इसे क्यो छूता है ? यह फिर हमारे काम नही आयेगा, इतना भी तू नही समझता ?" दृढप्रहारीको उन वचनोसे प्रचड क्रोध आ गया और उसने उस दीन स्त्रीको मौतके घाट उतार दिया । नहाता नहाता ब्राह्मण सहायताके लिये दौड आया, उसे भी उसने परभवको पहुँचा दिया। इतनेमे घरमेसे गाय दौडती हुई आयी, और वह सीगोसे दृढप्रहारीको मारने लगी। उस महादृष्टने उसे भी कालके हवाले कर दिया। उस गायके पेटमेसे एक बछड़ा निकल पडा, उसे तड़फडाता देखकर दृढप्रहारीके मनमे बहुत बहुत पश्चात्ताप हुआ । “मुझे धिक्कार है कि मैंने महाघोर हिंसाएँ कर डाली । मेरा इस महापापसे कब छुटकारा होगा? सचमुच | आत्मकल्याण साधनेमे ही श्रेय है।" ऐसी उत्तम भावनासे उसने पचमुष्टि केशलुचन किया । नगरके द्वार पर आकर वह उन कायोत्सर्गमे स्थित रहा। वह पहिले सारे नगरके लिये सतापरूप हुआ था, इसलिये लोग उसे बहुविध सताप देने लगे। आते जाते हए लोगोंके धूल-टेंलो, ईंट-पत्थरो और तलवारकी मूठोंसे वह अति सतापको प्राप्त हआ। वहाँ लोगोने डेढ महीने तक उसे तिरस्कृत किया, फिर थके और उसे छोड दिया। दृढप्रहारी वहाँसे कायोत्सर्ग पूरा कर दूसरे द्वार पर ऐसे ही उग्र कायोत्सर्गमे स्थित रहा। उस दिशाके लोगोंने भी उसी तरह तिरस्कत किया, डेढ महीने तक छेडछाड कर छोड दिया । वहाँसे कायोत्सर्ग पूरा कर दृढप्रहारी तीसरे द्वारपर स्थित रहा । वहाँके लोगोने भी बहुत तिरस्कृत किया। डेढ महीने बाद छोड देनेसे वह वहाँसे चौथे द्वार पर डेढ मास तक रहा । वहाँ अनेक प्रकारके परिषह सहन करके वह क्षमाधर रहा । छठे मासमे अनन्त कर्म-सम
SR No.010840
Book TitleShrimad Rajchandra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Jain
PublisherShrimad Rajchandra Ashram
Publication Year1991
Total Pages1068
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Rajchandra
File Size49 MB
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