SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 71
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५४ प्रस्तुत प्रश्न उत्तर- इसमें कठिनाई होती है अवश्य, और सदा ही इन दोनोंका विरोध भी देखने में आता है । फिर भी, इन दोनोंको साथ मिलाए बिना कोई भी स्थिति असंभव-सी हो जाती है । यो काहए कि निःसंग प्रेम ही निभ सकता है । संगकी आसक्ति जिस प्रेममें है उसके निभनेके लिए समाजमें अवकाश कैसे हो सकता है ? मोहयुक्त प्रेमके कारण उलझनें उपस्थित होती हैं । प्रश्न -- प्रेमके लिए क्या कोई आकर्षण आवश्यक नहीं है ? उत्तर - प्रेमकी प्रकृति ही आकर्षण है । प्रश्न - कहते सुना है दुखियोंसे प्रेम करना सीखो, गरीबोंसे प्रेम करना सीखो । वहाँ क्या आकर्षण हो सकता है ? अथवा कि वहाँ प्रेमकी बात ही कहना अनर्गल है । उत्तर - आकर्षण हो सकता तो है । अगर उनके दुख में हम अपना अन्याय देखें, तो उसके प्रति सचमुच बहुत बड़ा आकर्षण होनेका कारण हो जाता है | हमारा अपना रोग हमको किम कदर अपना मालूम होता है !- - सब पीछे, अपना रोग पहिले । एक रोग सत्र ओरसे हटाकर हमारा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है कि नहीं ? इसी तरह, लोगोंकी गरीबी क्या समाजके लिए रोग नहीं है ? इतनी चैतन्य-बुद्धि हममें अगर जाग जाय, तो मैं मानता कि समाजके दीन-दलितों में हमें आकर्षण भी हो आये । और वह आकर्षण छोट-मोटे आकर्षणों को नीचे ही छोड़ दे । प्रश्न - - किन्तु, आकर्षणमें तो मोहनेकी शक्ति होती है, न कि दुखी करनेकी । फिर ऊपर आप यहाँ कैसा आकर्षण बतलाते हैं ? उत्तर – क्यों, उस मोहमें दुःखकी सम्भावना क्या बिल्कुल नहीं है ? उस वक्त वह भी सुख-सा मालूम होता है अवश्य, किन्तु, आकर्षणका हेतु तो दुख यानी अपूर्णता ही है । वह दुःख ही आकर्षणद्वारा अपने लिए मानो चैनका मार्ग खोज निकालता है | आकर्षण खुद में सुखकर मालूम होता है, पर उत्पन्न वह सुखमसे नहीं हो सकता ।
SR No.010836
Book TitlePrastut Prashna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJainendrakumar
PublisherHindi Granthratna Karyalaya
Publication Year1939
Total Pages264
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy