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________________ २३६ ] आत्मकथां दिया, पत्नी के सामने भी व्याकुलता छिपाने की इच्छा हुई पर 5 T. कुछ तो छिप ही न सकी इसलिये उसे असली बातका आभास मिल गया और कुछ छिपाना उचित भी न समझा इसलिये मैंने भी वह बात साफसाफ प्रगट करदी | रात के समय दोनों ही चिरवियोग के निश्चय से बड़ी देर तक रोते रहे । पर इस के बाद मैं सम्हला, मैंने उसे जीवन मरण का ... " : रहस्य समझाना शुरू किया | मालूम नहीं उस दिन मैंने क्या क्या कहा पर जो कुछ कहा मुँहने नहीं हृदयने कहा ! सत्रह के पाँच वंजे तक मेरा वह व्याख्यान चालू रहा । इस के वाद मैंने देखा कि उस के हृदय से मौत का भय निकल गया है कम से कम इस बीमारी से मरने का डर तो उसे बिल्कुल नहीं रहा है । उस दिन के बाद उस के जीवन में जो उल्लास रहा वह उसकी बीमारी देखते हुये असाधारण कहा जा सकता है । एक वार अस्थिक्षय की एक दूसरी बीमार स्त्री को देखने वह गई, वह स्त्री चल फिर भी नहीं सकती थी, न जाने उसके साथ क्या चर्चा होने लगी जिसके अंत में उस वाईने मर जाउंगी । शान्ता को मृत्युभय से बड़ा आश्चर्य हुआ, बोली5. क्या तुम मौत से डरती हो? ऐसे दुःखमय जीवन की अपेक्षा मरना क्या बुरा है । मरने से दूसरा शरीर अच्छा ही मिलेगा ' उस समय प्रेमी जी आदि भी थे, उसकी निर्भयता से सभी को आश्चर्य हुआ । कार्लीकी रात की मेरी बातें उसने वेदवाक्य से भी अधिक प्रामाणिक रूप में दिल में जमाली थीं । उनके सहारे से उसने मानों मौत को जीत लिया था । उस को देखकर मुझे इस विचार कहा-- ऐसा करूंगी तो
SR No.010832
Book TitleAatmkatha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSatya Samaj Sansthapak
PublisherSatyashram Vardha
Publication Year1940
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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