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________________ योगशास्त्र:प्रथम प्रकाश अर्थ सोना, बैठना, रखना, लेना और चलना मावि कार्यों को क्रियाओं या चेष्टाओं पर नियंत्रण (नियमन) रखना व स्वच्छंद प्रवृत्ति का त्याग करना, दूसरे प्रकार को फायगुप्ति है। व्याख्या आगम में रात को ही निद्रा-काल बताया गया है। इस दृष्टि से साधु को मुख्यतया दिन में शयन करने का निषेध किया है । बीमारी, अशक्ति या विहार की थकावट अथवा वृद्धावस्था आदि के सिवाय साधक को दिन में सोना नहीं चाहिए। रात को भी पहर बीत जाने के बाद, गुरुमहाराज के सो जाने पर सीमित (अपने कद ने अनुसार मर्यादित) जगह देख कर जमीन को पूज कर संस्तारक (बिछाने का आसन) और उत्तरपट्टा खोल कर और बिछा कर काया का सिर से पैर तक (ऊपर से नीचे तक) मुखवरित्रका, प्रमानिका, एवं रजोहरण से प्रमार्जन कर संस्तारक (बिछौना) करने के लिए गुरुमहाराज की आज्ञा ले कर, नमस्कारमंत्र' और सामायिक सूत्र ('करेमि भंते सामाइयं') पढ़ कर, दाहिने हाथ का तकिया बना कर, परों को सिकोड़ कर अथवा मुर्गे के समान आकाश में पर रख कर प्रमार्जन करके फिर भमि पर रखे । फिर संकोच करने के समय प्रमानिका से या रजोहरण की फलियों से प्रमार्जन करे और करवट लेते समय मुखवस्त्रिका से शरीर प्रमार्जन करे, किन्तु दोनों समय में अतितीव निद्रा से शयन न करे। जहां रहे, वहां प्रमाणोपेत वसति में से तीन हाथ परिमाण वा प्रत्येक साधू अपने पात्रादि तमाम उपकरणों को समाविष्ट कर दे। जिस मामन या स्थान । की इच्छा हो, पहले उसे चक्षु से निरीक्षण कर रजोहरण से प्रमार्जन करे। बाहर का रजोहरण-सम्बन्धी निशिथिया बिछा कर बैठे, बैठने के बाद भी पैर लम्बे करने हों या सिकोड़ने हों तो पहले कहे अनुसार निरीक्षण व प्रमार्जन करे। चौमासे के काल में चटाई, दर्भासन व पट्टे आदि पर उपर्युक्त समाचारी से बैठे । दण्ड आदि उपकरण का भी निरीक्षण करके प्रमार्जन करे । आवश्यक कार्य के लिए साधु को बाहर जाना हो तो आगे घुसर-प्रमाण प्रदेश में दृष्टि डाल कर अप्रमाद-भाव से त्रस और स्थावर जीवों का रक्षण करते हुए धीमी-धीमी गति से गमन करना प्रशस्त है, कायोत्सर्गस्थ हो कर खड़े रहने के या सहारा ले कर बैठने के संस्तारक को पहले नजर डाल कर पडिलेखन और फिर दण्डासन से प्रमार्जन करना चाहिए । इन सभी चेष्टाओं पर नियंत्रण रखना, और स्वच्छन्द चेष्टाओं का त्याग करना, दूसरे प्रकार की कायागुप्ति है। अब पांच समितियों और तीन गुप्तियों का आगम-प्रसिद्ध मातृत्व बताते हैं ताश्चारतस्य जननात् परिपालनात् । संशोधनाच्च साधूनांमातरोऽष्टौ प्रकोत्तिता ॥४५॥ अर्थ उपर्युक्त पांच समितियां और तीन गुप्तियां साधुओं के चारित्र-रूपी शरीर को माता की तरह जन्म देने से, उसका परिपालन करने से तथा उसकी अशुद्धियों को दूर करने के कारण व उसे स्वच्छ निर्मल रखने के कारण 'आठ प्रवचन-माता' के नाम से प्रसिद्ध हैं। व्याख्या समितियां और गुप्तियां शास्त्र में आठ मातागों के नाम से प्रसिद्ध हैं। मातृत्व के कारण ये हैं-जैसे माता पुत्र के शरीर को जन्म देती है, दुग्धादि पिला कर शरीर का रक्षण करती है और
SR No.010813
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmavijay
PublisherNirgranth Sahitya Prakashan Sangh
Publication Year1975
Total Pages635
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size48 MB
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